Here is why businesses can’t retain good employees

“I keep my staff working late because my home is nearby. They think I am a dragon.”

An advertisement screams echoing desires of a section of entrepreneurs. But think over. Who would love to work for a dragon?

A lot of entrepreneurs take great pride in the fact that they are “successful” in making their employees toil for unusually long hours. In other words, they measure the success of their leadership by the extent of exploitation they are able to exert on their people.

This is a completely misplaced concept.

Imagine, who would like to work in such an organization where their efficiency, productivity and loyalty is measured by the number of hours they put in? Where they are treated more like a machine than a human being?

Only those people who don’t get employment elsewhere may agree to work at such an exploitative places. In other words, losers, who don’t have any choice would agree for such an exploitation. And losers can’t help you build strong organization.

This exploitative approach is one reason why small, unorganized firms don’t get good employees. It is a vicious cycle which needs to be broken.

Entrepreneurs must remember that quality of work is more important than quantity of hours.

Business management lessons from AAP’s failure

The sudden rise and equally sudden fall of Aam Aadmi Party has some important learning lessons for businesses which are currently in the growth mode.

Many businesses which start with a rapid growth in the beginning, start faltering after growing to a specific size. Maintaining growth momentum after attaining some size becomes a real challenge which few companies can overcome. Others either stagnate at that level or go back downhill.

AAP faced some management challenges which it could not overcome. Growing companies also face similar challenges. The debacle of AAP in 2014 elections has some management lessons for growing businesses.

Arvind Kejriwal’s
AAP rose to popularity really too fast. It promised a hope of a corruption free India. It is a success story of a brand getting hugely popular too fast. But, the brand AAP did not live up to the hype it generated. Why? Here are some reasons.

Management Bandwidth
One reason for AAP’s failure is the lack of Management Bandwidth. Just like many suddenly grown companies, AAP, too , faced lack of quality, talented and experienced manpower who could manage the party’s affairs and could provide leadership at various levels of the organization.

Only Branding Focus,
No marketing
AAP and Arvind Kejriwal are good at grabbing media attention and thereby keeping their brand afresh in popular mind. Somehow or the other AAP and its leader kept themselves in the news. Huge advertising budget and a lot of noise in the media may ensure brand awareness and visibility, it may not necessarily ensure marketplace success of the product. The product has to deliver on the brand promise. Here is where AAP failed. Media hype was good, but the party failed to deliver what it was expected to. Particularly, after the Delhi government fiasco, it became clear that AAP was good at agitations and not in execution. Along with focusing on popular attention, AAP should also have developed its own governance and administration arms.

Lack Of Structure
In any family managed business, there is no structure and the family members monopolize control over all decisions and resources. AAP functioned just like such a  business where all decision making rested with a select group of people. This lack of democracy disillusioned many big names in the party who deserted it recently.

Even though it is not the end of the road for AAP and it can definitely recover from the recent setback, it will have to make greater efforts to bounce back due to its own mistakes.

The business which wishes to cash in on its initial success must learn from these mistakes and avoid them.

एक सामान्य भारतीय का श्री नरेन्द्र मोदी को खुला निवेदन पत्र

आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी साहब,

सादर प्रणाम |

भारत देश का एक सामान्य नागरिक भी अपनी महेनत, मनोबल और महत्त्वाकांक्षा के बल पर सर्वोत्तम स्थान पर पहुंच सकता है, इस बात का ज्वलंत प्रमाण पेश कर ने के लिए आप को हार्दिक अभिनंदन तथा इस देश में सुराज्य लाने के आप के संकल्प और प्रयासों की सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं |

आप को यह पत्र लिखने की प्रेरणा मुझे मिली है उस आशा से जो आप के आगमन ने मेरे जैसे करोडों सामान्य भारतवासियों के मन में जगाई है | राजनीति और politicians पर से हम भारतवासियों का भरोसा उठ गया था, जो आपने पुन:स्थापित किया है |

भारत की विकासयात्रा को सही पटरी पर लाने के लिए अाप को बहुत सारे और बहुत बड़े काम करने हैं | और आप सारी कोशिशें करेंगे ऐसा हमें विश्वास है | लेकिन इन बड़े कामों की योजना बनाते वक्त आप हमारे जैसे करोड़ों छोटे लोगों के जीवन की समस्याओं पर थोडा गौर करके इन समस्याओं को सुलझाने के हेतु को केन्द्र में रखकर सरकार की नीतियां बनायेंगे, तो आप के आगमन से पैदा हुइ आश साकार स्वरुप ले पाएगी | मैं और मेरे जैसे भारतवर्ष के अन्य सामान्य नागरिकों की आप से कुछ अपेक्षाएं हैं, जो मैं यहां प्रतिघोषित करता हुं |

१) किसी भी सरकारी डीपार्टमेन्ट से छोटा या बडा कोई भी काम कराना हो तो भारत में किसी ना किसी सरकारी अफ्सर या politician को पैसा देकर “सेटींग” करनी ही पडती है | एक बार एक किसी पावरफूल व्यक्ति के साथ “सेटींग” हो गइ फिर फटाफट काम होने लगता है | भारत की यह अनोखी Single Window Clearing System, यह “सेटींग” बिझनेस, बन्द हो और योग्यता अनुसार काम हो ऐसी अपेक्षा |

२) बचपन से ही भारतवासीयों को पुलिस से डरने का सिखाया गया है | भारत के politicians इस डर को अच्छी तरह से समझ गये हैं और लोगों को डराकर अपना काम कराने के लिए पुलिस को use करते हैं | नीडर भारत के लिए निष्पक्ष पुलिस की आवश्यकता है | पुलिस को politicians के डर से मुक्ति मिलेगी तो ही पब्लिक को पुलिस के डर से मुक्ति मिलेगी | सामान्य भारतवासी को खुद को हुए अन्याय की फरियाद करनेे के लिए पुलिस स्टेशन तक जाने में जो डर लगता है, उस डर को दूर करने का निवेदन |

३) कोइ भी व्यक्ति अपना १००% तभी दे सकता है, जब वह भयमुक्त हो | लोगों को सरकार से यह अभयदान मिल सकता है, लेकिन आज पुलिस या कोइ भी सरकारी अमलदार खुद ही आमजनता को डराकर, भयभीत करके उनका फायदा उठाते हैं | हर राज्य में एक कोमन फोन-नंबर की हेल्प-लाइन देकर लोगों को किसी भी सरकारी अमलदार से भयमुक्ति दिलायें ऐसी प्रार्थना |

४) जनता को हेल्प करने के लिए हम अलग-अलग प्रकार की हेल्प-लाईन तो चालु कर डालते हैं, लेकिन कुछ महिनों बाद उसे attend करनेवाला ही कोइ नहीं होता | अगर होता है, तो वह कोइ गुस्सेवाला भूखा-प्यासा, पीडित आदमी होता है, जो हेल्प कम करता है, भौंकता ज्यादा है | हेल्प-लाइन पर बिच-बिच में फोन कर के वह सो न जाय ऐसी व्यवस्था हो तो सही मदद होगी |

५) दूसरा डरावना शब्द है Taxes | एक तो अनेक प्रकार के टैक्ष और उपर से उनका पेपरवर्क | टैक्ष के सारे कायदे कानून इतने पेचीदे हैं की उन सब का पालन करना अत्यंत मुश्किल है | टैक्ष की पूरी प्रक्रिया को सरल बनाना जरुरी है | दूसरी यह मान्यता की सरकार को टेक्ष देंगे तो ९०% हिस्सा politicians और सरकारी कर्मचारी “खा” जाएंगे | यह खाना-पीना बन्द हो और जनता से मिले टैक्स का सही उपयोग हो ऐसी गुज़ारीश |

६) भारत में सरकार कोइ भी प्रोजेक्ट के पीछे १०० रुपये खर्चेगी तो उस में से २५ रुपयों का ही काम होगा ऐसी मान्यता है | बाकी की रकम अनेक जरुरतमंद लाभार्थी लोगों में बंट जाएगी | यह जरुरतमंदों में बंटवारा बन्द हो और पूरी रकम नियत प्रोजेक्ट पर खर्च हो ऐसी पारदर्शक व्यवस्था करने की प्रार्थना | हमारा देश गरीब नहीं है, लेकिन सरकार-Politicians और सरकारी कर्मचारियों के लोभ-लालच की वजह से बहुत धन लीकैज हो रहा है | इस लीकैज को त्वरा से भरें |

७) कश्मीर के ओमर अब्दुल्लाह जब राजनीति में आये तब एक टी.वी. इन्टरव्यू में उन्होंने कहा था “मेरे पिताने कहा कि पोलिटीक्स एक अच्छी लाईन है, इस लिए मैंने राजनीति में आने का निर्णय लिया |” शायद ओमर अब्दुल्लाह उस वक्त नासमज थे इस लिए उनके दिल की बात ज़बान पर आ गई | लेकिन अकेले फारुक अब्दुल्लाह ही नहीं, भारत के सारे politicians राजनीति को Profession नहीं लेकिन एक Business मानते हैं, और ज्यादातर किस्सों में देश और उसकी प्रजा को लूटने का कारोबार चलाते हैं | यह धन्दा बन्द करें |

८) किसी भी सरकारी अस्पताल में सारी सुविधाओंका बजेट पास होते हुए भी आम जनता को सही ट्रीटमेन्ट नहीं मिल सकती | सरकारी अस्पताल world class सुविधा और सर्विस दे पायें ऐसी व्यवस्था की अभिलाषा |

९) सफाई के लिए जरुरत से ज्यादा स्टाफ और साधन होते हुए भी हमारे देश का कोई भी जाहीर स्थल हमेशा गंदा ही रहता है | रेल्वे-बस स्टेशन, होस्पिटल्स, स्कूल्स, सरकारी दफ्तर, राह-रस्ते, गार्डन सब कुछ एरपोर्ट की तरह साफ-सुथरा और चकाचक रखने का बजेट तो पास हो जाता है, लेकिन काम नहीं होता | सिर्फ बजेट ही नहीं, काम भी उसी क्वोलिटी का हो यह देखें | इस परिस्थिति में १००% सुधार संभव भी है, और अपेक्षित भी है |

१०) कोई भी सरकारी नौकरी मतलब “चांदी” | सरकारी नौकरी मतलब बिना काम किये पैसा कमाने का लाइसन्स | सरकारी नौकरी मतलब “उपर की कमाई” का अविरत स्त्रोत | सरकारी नौकरी सब से पहले एक सेवा कार्य है, और अपने कार्य से देश की सेवा कर के रोजगार पाने का एक प्रामाणिक ज़रिया है, यह भावना सरकारी दामादों के मन में जाग्रत हो ऐसे ठोस कदम की अपेक्षा |

११) सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले अफ्सरों को यहां-वहां तबादला कराने की और उनका promotion करने की सत्ता politicians के पास होने से अफ्सर खुले मन से काम नहीं कर सकता | वह डरा हुआ रहता है | अफ्सरों की भर्ती, तबादले या प्रमोशन को योग्यता के आधार पर पारदर्शक बनायें |

१२) जिन commercial activities में सरकार की कंपनियां (PSUs) हैं, उन में से ज्यादातर PSUs में जरुरत से बहुत ज्यादा स्टाफ और अन्य resources हैं फिर भी उन के private sector के competitors से उनका नफा कम है, या वह नुकसान कर कहे हैं | उन सब को अपनी कार्यक्षमता और profitability बढ़ाने का मौका दिया जाय | और अगर वह ऐसा न कर पायें तो उन्हें Private कंपनियों को सोंपा जाय |

१३) देश के अलग अलग राज्यों में कुछ ऐसे विस्तार हैं, जहां किसी लोकल गुंडे, politician, ग्रुप या किसी कौम की सरकार चलती है | ऐसी हर parallel government को चुन-चुन कर उस के उपर भारत के सार्वभौमत्व को स्थापित करने का आवेदन |

१४) इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बडे बडे प्रोजेक्ट तो बन जाते हैं, लेकिन उन्हें आम आदमी कैसे use कर पाये ऐसा ध्यान में रखा जाय, तो बहुत अच्छा होगा | यहां मुंबइ के T2 जैसे टर्मिनल, या बडे हाइ-वे तो बन जाते हैं, लेकिन उनके अंतिम फिनिशिंग या योग्य signage जैसे छोटे काम बाकी छोड दिये जाते हैं, जिससे सामान्य जनों का समय-शक्ति व्यय होता है और उन्हें काफी असुविधाओंका सामना करना पडता है |

१५) आज ज्यादातर सरकारी स्कूलों या कोलेज में शिक्षा का स्तर एकदम निम्न कक्षा पर चला गया है | बच्चों को डीग्रीयां तो मिलतीं हैं पर उन्हें कुछ प्रेक्टिकल ट्रेनिंग न मिलने की वजह से वह किसी काम के पात्र नहीं होते | शिक्षा-व्यवस्था खराब होने की दूसरी एक वजह है, शिक्षकों की गुणवत्ता | पगार कम होने की वजह से अच्छे लोग शिक्षक बनना पसंद नहीं करते | अर्थहीन शिक्षा-व्यवस्था बेरोजगारी की मुख्य वजह है | शिक्षा को अर्थपूर्ण बनाने की बिनंती |

१६) भारत में बेरोजगारी का एक दूसरा बडा कारण है, Unions | इधर भी अलग-अलग राजनैतिक पार्टीयां कम से कम काम करके ज्यादा लाभ पाने के सपने दिखाकर employees की आदतों के साथ बिझनेस की कार्यक्षमता और profitability बिगाड रहीं हैं | Labour laws में उचित परिवर्तन की आवश्यकता है | नौकरी मिलना नहीं बल्की काम पाना हक होना चाहिए | जोब मार्केट में राजनैतिक पार्टीयां तथा युनियनों की दखल बन्द होंगी तो ही सब का भला होगा |

१७) Information Technology का सही उपयोग करें | आम जनता को रोज काम आनेवाली information किसी वेबसाइट या और किसी माध्यमों से समय पर मिले तो हर साल लाखों दिनों का समय बच जाएगा | इन्डीयन रेलवे की online बूकींग की साइट तत्काल के बूकींग के समय दो घंटों तक खुले ही नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए | इस के जैसे अनेक उपायों से आमजनता का अधिकांश समय बचेगा जो देश के आर्थिक विकास में उपयुक्त हो सकता है |

१८) मुंबइ जैसे शहरों में फुटपाथों पर चलने की जगह ही नहीं हैं | फूटपाथ पर फेरिवालों तथा व्यापारियों का कब्ज़ा है | फुटपाथ मुक्त हों तथा चलने योग्य बनें ऐसी अपेक्षा |

१९) मुंबइ को Shanghai जैसा बनाने के वायदे देकर काफी सरकारोंने अनेक प्रोजेक्ट पास करवाकर करोडों रुपयों का खान-पान किया है | मुंबइ के ज्यादातर रास्तों पर कहीं भी 100 मीटर का अच्छी गुणवत्ता का, बिना उबड-खाबड का रास्ता नहीं है | Shanghai जैसा बनाने के लिए अनेक लोगों ने Shanghai की यात्राएं कीं, बडे बजेट पास करवाये, और अंत में हमें खड्डे ही मिले हैं | ऐसी सपनों की सौदागरी बन्द होगी ऐसी उम्मीद |

२०) मुंबइ की लोकल ट्रेन तथा सीटी बस सर्विस अच्छी है लेकिन उसे आधुनिक और कार्यक्षम बनाने की जरुरत है | सफाइ, सुरक्षा पर ध्यान जरुरी है | ट्रेन-बस की डिझाईन या उस संबंधी अन्य कोइ निर्णय लेने वाले बडे लोग इन ट्रेन-बस में सफर करें और लोगों को क्या परेशानियां होतीं हैं उस का वास्तविक अनुभव करें ऐसा compulsory बनायें | मुंबइ जैसी पब्लिक ट्रान्सपोर्ट व्यवस्था सारे शहरों में स्थापित करें ऐसी अपेक्षा |

२१) न्याय व्यवस्था में भरपूर परिवर्तन जरुरी है | तारीख-पे-तारीख की वजह से Indian Judiciary पर से आम जनता भरोसा उठ गया है | “कानून है” यह सबूत न्याय व्यवस्था की ओर से पेश हो ऐसी व्यवस्था करेंगे तो बडी महेरबानी होगी |

२२) भारत में किसी भी सरकारी दफ्तर में जाएंगे तो अपना काम कितने समय में पूरा होगा इस की कोइ गेरंटी नहीं है | सरकारी कर्मचारीयों में उन के तथा आम जनता के समय की कीमत के विषय में जाग्रति आये और उन में कोइ भी काम पूर्वनिश्चित समय-अवधि में पूरा हो ही जाय ऐसी accountability स्थापित करेंगे तो करोडों मानव दिनों का समय बचेगा |

भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है, लेकिन भारत के politicians और कुछ multinational कंपनियां हीं इस का साक्षात्कार कर रहे हैं | उपर कथित बातों पर कुछ ठोस काम होगा, आम जनता की जिंदगी आसान होगी तो मेरे जैसे सामान्य नागरिकों को भी भारत सोने की चिड़िया ही महसूस होगी |

हार्दिक शुभेच्छाओं के साथ आभार…

– भारत का सामान्य नागरिक

राजनाथ सिंघ जी से बिझनेस लीडरशीप का पाठ

नरेन्द्र मोदी ने अपने व्यक्तिगत charishma दिखाकर बीजेपी को कल ऐतिहासिक बहुमत दिलाया है |
मोदी जी को नापसंद करनेवाले ऐसा कह सकते हैं कि यह तो पूरी बीजेपी के प्रयत्नों का नतीजा है, या यह anti-congress  wave है जिसका फायदा बीजेपी को मिला है…

जो कुछ भी हो, लेकिन एक बात तय है कि अगर बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्रीपद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया होता, तो बीजेपी को इतनी भारी सफलता किसी हाल में हांसल नहीं होती | इस भारी मात्रा में बीजेपी की सफलता का पूरा श्रेय मात्र दो व्यक्तियों को जाता है | एक तो नरेन्द्र मोदी खुद और दूसरे बीजेपी के अघ्यक्ष राजनाथ सिंघ |

इस पूरी यशगाथा में राजनाथ सिंघ ने एक बुझु्र्ग, परिपक्व और दूरदर्शी नेता की भूमिका बखूब निभाई है |

जिस तरह उन्होंने नरेन्द्र मोदी की काबिलियत को पहचानकर, उन पर पूरा भरोसा रखकर, बहुत सारे दिग्गजों के खिलाफ जाकर भी नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदारी सौंपकर भारत को एक नरेन्द्र मोदी नाम की नइ आशा दिलाइ है, उस पूरे उदाहरण से हम अपने बिझनेस के लिए एक अच्छा पाठ सिख सकते है |

किसी भी विकासशील बिझनेस में दो प्रकार के employees होते है | एक ऐसे जो बहुत पुराने होते हैं, जो बिझनेसमेन के साथ शुरुआत से जुडे होते हैं | उनकी योग्यता वफादारी तथा बिझनेस जैसे है वैसे चलाये रखने की क्षमता तक सीमीत होती है | यह लोग बिझनेस को एक लेवल से आगे ले जाने के लिए असमर्थ होते हैं, फिर भी उन्हें ऐसा लगता है कि वो ही बिझनेस के सूत्रघार हैं और वह खुद नहीं होंगे तो बिझनेस बिखर जाएगा | वास्तव में यह लोग ही बिझनेस की विकासयात्रा में एक बाधा होते हैं | वह खुद तो कुछ ज्यादा कर नहीं सकते और किसी नये व्यक्ति को आ कर कुछ परिवर्तन लाने की अनुमती भी नहीं दे सकते |

दूसरे कुछ ऐसे काबिल नये employees होते हैं जिन में बिझनेस को आगे ले जाने की भरपूर काबिलियत रहती है | उन में बिझनेस की नइ चुनौतियों का सामना करके उसे विकास की नइ ऊंचाईयों तक पहुंचाने की क्षमता होती है |

बीजेपी में भी ऐसे पुराने लोग हैं जिन की क्षमता पार्टी को एक लेवल से ज्यादा ले जाने की बिलकुल नहीं है | अगर ऐसे ऐतिहासिक दिग्गजों को बागडोर सौंपते तो बीजेपी को इतनी सफलता कभी नहीं मिल पाती |

राजनाथ सिंघ को सही व्यक्ति की, उस की काबिलियत की पहचान है, और ऐसी व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपकर, पुराने दिग्गजों को समझा-पटाकर, उन्हें अपने स्थान पर रखकर नये सेनापति को पूरी स्वतंत्रता देकर, उस के पीछे चट्टान की तरह खडा रहकर, उस का हौंसला बढ़ाकर उन्होंने भारत के इतिहास को एक नया मोड दिया है |

बिझनेसमेन को भी अपनी कंपनी में स्थापित स्पीड-ब्रेकर्स को अपनी जगह पर रखकर, नये काबिल ड्राइवर को चुनकर उसे कंपनी की यात्रा आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता देनी चाहिए | स्पीड-ब्रेकर नडेंगे, रुठेंगे, नखरे करेंगे | लेकिन चिंता मत करो, क्यों कि यह स्पीड-ब्रेकर कहीं जा नहीं सकते | आज के समय में कोइ दूसरी कंपनी इस पुराने स्पीड-ब्रेकर को नहीं रखेगी | सही ड्राइवर ही आप को आगे जाने में मदद कर सकता है | उसे पेट्रोल दो, उस पर ब्रेक मत मारो |

सही ड्राइवर अपनी काबिलियत से किसी भी पार्टी, देश या कंपनी को नइ राह, नइ आश दिखा सकता है | राजनाथ सिंघ के “नरेन्द्रभाइ” ने यह साबित कर दिया है | हमें अपने बिझनेस के लिए उन से लीडरशीप का यही पाठ सिखने जैसा है |

Yes Ms Shobhaa De, India knows how to differentiate between ’56 Ki Chhati’ and ‘D Cup’

I read a quote by Shobhaa De in The Times Of India, Mumbai dated 5th March 2014. She’s quoted “56-inch chest. This is political chest-thumping at its most ridiculous. What would happen if a woman candidate were to speak of her D cup?” on Narendra Modi’s election rhetoric.

Respected Ms De, you, being an Indian, are well aware of the nuances of our lingo. The term ’56 Ki Chhati’ and ‘D Cup’ don’t amuse the same target. These are targeted to two entirely different segments of the society.

Yes, some people in the society may be interested in knowing about ‘D’ or other cup sizes, and they may be lured by such characteristics, but I believe that won’t be a majority. For obvious reasons, Rakhi Sawants of the society are not taken seriously when discussing the matter of nation’s future and its leadership, even though they may be hit on other platforms and on other occasions where curves and dimensions of a different type matter.

The larger segment of India today is more interested in somebody more resolute and bold who has the courage to lead the country with his vision, audacity and determination. This could be a man or a woman. ’56 Ki Chhati’ is gender-neutral, because it is not in the body, it is somewhere above the shoulder, in the mind, where it matters.

To lead a country, ’56 Ki Chhati’ is a must. To drive a misguided leader, a ‘D Cup’ may suffice in some special cases, as old and recent history has shown.

India needs a person with the metaphorical ’56 Ki Chhati’ to lead it. Others may flaunt their ‘Cups’ to win the battles of the other kind.

What makes Radhakrishnan Pillai a bestselling author?

Radhakrishnan Pillai’s latest book Chanakya’s 7 Secrets of Leadership, has sold 10,000 copies in a month since its release in late January 2014, making it a bestseller. What makes him a bestselling author?

I have known and observed him since last few years. Here are my views on his well-deserved success.

He is authentic
Radha is intelligent and genuine along with being articulate. Amongst the current breed of Business Gurus where many fake and irritatingly dumb copy-pasters are masquerading as Business Gurus, Radha comes as a refreshingly fresh air.

He is focused
He has consistently focused on his studies of Chanakya and his teachings. He is not talking of anything else. Clear, unwavering focus.

He interprets and not simply translates
Radha has made it a mission to spread the learnings from Chanakya. He does not simply translate the verses, he simplifies them with his own insights, making the learning relevant to the contemporary times.

He writes to express, not impress
He uses facts and thoughts to express and does not resort to well rhyming words to impress his audience.

He is not out to build a personal brand
Many business writers write to add the word ‘Author’ on their visiting card. Radha is not driven by such purely commercial interests. He is not trying to lure some unsuspecting businessmen to get some consulting or executive coaching assignment through his writing work.

He is trying to propagate wisdom not encash it
Radha is a student of leadership wisdom of the ancient India. He is living a mission. He is driven by something larger than money can buy or valuers can evaluate.

He is not trying to sell anything
Radha does not write to sell his seminars or workshops. Neither is he bent on building a tribe where he will be worshipped as a demigod.

Radha, This is my tribute to your passion and mission. Keep doing the great work…

Narendra Modi, please MODIfy public transport in Ahmedabad

Narendra Modi has undoubtedly done a lot to MODIfy Gujarat.

His no-nonsense approach towards getting things done is what India needs. In the absence of any other equally resolute, determined, articulate and confident leader who also has huge public acceptance, he remains the only hope for a MODIfied India. He has clearly shown by his work in Gujarat that he has all the credentials to surely make a positive difference to India.

But, among all the good and great things that he has done for Gujarat. There is one small thing which needs his attention. And that is, public transport in Ahmedabad. My recent and earlier visits to the city showed that the Ahmedabad Municipal Transport Service (AMTS) is anything but efficient. The frequency is bad, buses are in bad shape, the drivers are careless and always-in-hurry and the service is pathetic.

The auto rickshaw service in the city is worse. The metering system is almost 30-years old. The auto drivers are always aiming at fleecing the passengers for some easy money by taking new people in the city for a ride literally. The general attitude of the autowallas in the city is rude and greedy. I have hardly come across any co-operative auto man in Ahmedabad. Their lot in the railway station area is the worst. They don’t follow metering system and even the Traffic Police don’t do anything even after told to intervene.  There is also a shared auto system (called ‘shuttle’) in the city which carries at times EIGHT passengers along with the driver. I have sat in such a ‘shared’ auto with 7 others… It is downright risky. But in the absence of any other viable transport system, people have to take such risks.

Ahmedabad is growing in all directions, but this growth will not sustain if corresponding public transport facilities are not added. Currently, public transport infrastructure in the city is grossly inadequate, and traffic police is virtually invisible to control the menace of auto rickshaws.

NaMo should intervene and influence the town developers in Ahmedabad, with the example of Mumbai. A lot of progress of Mumbai has happened thanks to its robust public transport system of local trains, buses and auto/taxis.

Till then, a visitor to Ahmedabad will have to bear the brunt of the rude, greedy auto-men and inefficient bus services. This makes the city visit memorable for all the wrong reasons. Along with developing all other parts of the state, NaMo must immediately look into this issue and MODIfy it also.

Leadership lessons from young CEO Tarun Katial

The young CEO of Reliance Broadcast Network Ltd (92.7 Big FM) recently shared his experiences as a young leader. Here are some of his insights :

Culture building is the key thing : The leader’s job is to build a strong culture in the organization. A company is known for its culture. When an employee leaves, he may come back to our company, if he can’t adjust to the culture at the new organization.

How to win confidence as a new leader : A leader’s success in the new organization depends on his success with the people. Insecurity in people’s minds must be addressed quickly and surely. When a leader goes to the new organization, he should not bring ‘his’ people from outside or from his own circles. He must try and understand existing set of people and let them perform at their optimal potential without fear.

How a leader should take decisions : The values that our parents teach in childhood like honestly, transparency, humility etc. must be always remembered because these basic moral values can be our consistent compass and they can always help us in handling crisis and challenges of our work life. According to Tarun, when in confusion about taking some important, sensitive decision, one simple method can be to ask yourself “Would my parents do this to me?” or “Would I do this to my child?”. Answer to these questions may clearly provide you a way out of the dilemma.

How to identify winners in the team : Just like any sports game of Cricket, Football etc, there are two types of people : Players and Fans or spectators. Players are those who work. Who put in hard work. Who don’t run away. Who provide stability. Fans are those who look for failures and excuses for not doing or getting things done. Find out the players and fans in the organizations. Players must be nurtured. Players will provide stability always whether we may win or lose a particular game. Fans will crib, live in the past and will eventually quit. Keep the players. They provide stability, which is very vital for the success of an organization.

How to develop people : Give time to people as much as you may need to complete a task. Don’t sit on their neck. Don’t create favorites. Treat all with the only yardstick of performance. A leader’s job is to make sure that everybody in the team wins. With people, be transparent, not translucent, because your duality will become apparent soon and you will lose trust of your people. Develop an ability to be empathetic and to look within by regularly spending some time with yourself.

How to get accepted as a leader of the people elder to you : Humility is the only approach to win confidence and co-operation of people older than us. With them, we should not use Ego or Position Power. Tarun said he always calls the older people respectfully by addressing them “Sir” even if they may be structurally reporting to him.

Really, the young CEO of Big FM gave some Big lessons on leadership. May be only because of his humility and commitment towards people  development, he has moved ahead rapidly in his career. Tarun has not given up his adolescence as far as seeking guidance form parental teaching is concerned. If the child in us remembers his childhood and its learning, many of the problems of adulthood can be resolved.

How do your people feel when you are away from office?

In a company one day, an employee repeatedly called reception from his intercom at his desk. After 6-7 calls, the reception got irritated and told him “I have already told you SIX times he is not coming to office today. Why are you calling again and again asking whether boss has come to office or not?”

The person said, “I am sorry to bother you, but it sounds so pleasant to hear that the boss is not coming to office today. Sun ke bahot achchha lagta hai… Baar baar sun ne ko man karta hai…!!!”

Is this what your people feel when you are away from work? Are they relieved when you are absent? Is it a day of celebration for them when you do not go to office?

If answer to any of the above questions is “Yes”, something is seriously wrong with your leadership. There is a disconnect between you and your people. In such a situation, they working wholeheartedly towards common goals is less likely. Your presence is causing a sense of fear or resentment among them. Under the dark shadow of such negative feelings, how can they work cheerfully and wholeheartedly?

People must feel inspired when you are around. They must feel motivated when they find you among them. This is possible when they are happy in your presence and they are not afraid, when they do not dread your presence. In fact, your presence gives them tremendous morale boost and they feel empowered, encouraged and free when you are around.

People were afraid of Hitler. But they did not like or love him. They hated him. Due to his power, they obeyed his orders, although unwillingly, but they were always yearning to get away from him. People hate Hitlers.

Hitler-like, arrogant, rascal, idiot Hari Sadu always gets it back as soon as people hear from somebody like They joyfully leave as soon as they get a chance elsewhere. It may be fashionable to like to be called a Hitler, but Hitler did not build a lasting organization. By his arrogance and high-handedness, he destroyed whatever was there.

Other than holding their salary, do something positive such that people miss you when you do not go to office. Then, along with hands, their hearts also will join to help you achieve your dreams.