Here is why businesses can’t retain good employees

“I keep my staff working late because my home is nearby. They think I am a dragon.”

An advertisement screams echoing desires of a section of entrepreneurs. But think over. Who would love to work for a dragon?

A lot of entrepreneurs take great pride in the fact that they are “successful” in making their employees toil for unusually long hours. In other words, they measure the success of their leadership by the extent of exploitation they are able to exert on their people.

This is a completely misplaced concept.

Imagine, who would like to work in such an organization where their efficiency, productivity and loyalty is measured by the number of hours they put in? Where they are treated more like a machine than a human being?

Only those people who don’t get employment elsewhere may agree to work at such an exploitative places. In other words, losers, who don’t have any choice would agree for such an exploitation. And losers can’t help you build strong organization.

This exploitative approach is one reason why small, unorganized firms don’t get good employees. It is a vicious cycle which needs to be broken.

Entrepreneurs must remember that quality of work is more important than quantity of hours.

कर्मचारियों की कार्यक्षमता कैसे बढ़ाएं…?

किसी भी कंपनी में काम करनेवाले कर्मचारी अगर खुश होंगे, तो वह अच्छा काम कर पाएंगे |

लेकिन वह खुश क्यों नहीं रह सकते हैं?

काम और पर्सनल लाइफ के संतुलन के लिए समय का अभाव उन्हें परेशान करता है | हफ्ते में ६ दिन १०-१२ घंटों की ड्यूटी और ट्रावेलींग के समय के कारण ज्यादातर लोग अपने घर में एक Visitor ही होते हैं | लंबे समय तक अगर यह चलता रहता है, और बिच में कभी छूट्टी ही नहीं मिलती, तो उस का स्ट्रेस लेवल बढता रहता है |

इस की एक साइड इफेक्ट यह होती है कि ड्यूटी के समय पर लोग टैन्शन कम करने के लिए टाइम पास करने में या अपने पर्सनल काम में जुडे रहते हैं | उनकी कार्यक्षमता घटती है | किसी भी ओफिस में २० से ४० प्रतिशत समय व्यय ही होता है |

इसी लिए हर कर्मचारी को एक साल में कुछ छूट्टीयां मिलनी ही चाहिएं ऐसे कानून बनाए गये हैं | कर्मचारियों के भले के लिए, उनके सर्वांगी विकास के लिए यह जरुरी है |

कंपनी के बोस या पार्टनर-डिरेक्टर अपनी मरझी के अनुसार आते-जाते हैं, अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक कार्यों के लिए बाहर जाते हैं, या छूट्टीयां भी लेते हैं | यही स्वतंत्रता कर्मचारियों को नहीं होती |

यह हकिकत है की सभी को ऐसी स्वतंत्रता दी जाए तो उससे नुकसान होने के चान्सीस हैं, क्यों की कुछ कर्मचारी उस का गलत फायदा भी उठा सकते हैं | यह वैसे कर्मचारी होते हैं जो घडी या केलेन्डर देखकर सिर्फ हाजरी भरने के लिए ओफिस में आते हैं | उन के लिए ड्यूटी भरना काम करने से ज्यादा महत्त्व रखता है |

लेकिन साथ साथ यह भी याद रखना जरुरी है कि कर्मचारी भी इन्सान हैं, उन की भी ज़िंदगी है, वह मशिन नहीं हैं | जो अच्छे कर्मचारी हैं, जो हाजरी भरने के मुकाबले काम करने पर ज्यादा ध्यान देते हैं, उन की ड्यूटी और पर्सनल लाइफ का बेलेन्स बिगड न जाए इस लिए उन्हें जरुरत के समय पर कुछ छूटछाट दी जाए तो वह खुश होंगे और अपना काम अौर भी अच्छी तरह से और दिल से कर पाएंगे, उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी |

छूट्टीयां या समय पालन के मामले में मालिकों और कर्मचारियों के बिच बहुत ज्यादा भेदभाव होगा, तो उन्हें लगेगा की तुम्हारा खून खून, और हमारा खून पानी?

यह कंपनी के लिए नुकसानकारक होगा | ऐसे भेदभाव मिटने चाहिए…| सिर्फ ड्यूटी के घंटों पर नहीं, परंतु कार्यक्षमता पर भी ध्यान देना चाहिए |

भारत में न्याय व्यवस्था क्यों अर्थहीन हो गई है ?

१९७३ में दिल्ही की सीटी बस DTC का एक कन्डक्टर एक महिला पेसेन्जर को १५ के बदले १० पैसों की टिकिट देता है | चेकींग स्कवोड इसे पकडती है | डीपार्टमेन्ट इन्कवायरी शुरु होती है |

१९७६ में इन्कवायरी का रीपोर्ट आया, उसे नौकरी से निकाला गया | उसने लेबर कोर्ट में अपील की |

१९९० में लेबर कोर्ट का फैसला आता है | उस कन्डक्टर को वापस काम पर लेने का आदेश DTC को दिया जाता है | DTC हाइकोर्ट में अपील करती है |

२००८ में हाइकोर्ट DTC की अपील नकारती है | DTC फिर से Review Petition दाखिल करती है |

और अब मामला शुरु होने के ४१ सालों के बाद २०१४ में उसकी सुनवाई हो रही है |

नोंधनीय बात मात्र यही नहीं है कि ५ पैसों के मामले का केस ४१ सालों से चल रहा है, किंतु यह साबित करता है की भारत की न्याय व्यवस्था कितनी हास्यास्पद और अर्थहीन है |

ऐसी न्याय व्यवस्था के कारण ही देश में मुझरिम गुनाह करने के बाद भी बिना रोक-टोक घुमते रहते हैं | जिसे कानून की अर्थहीनता का पता चल गया है, वह बेफिक्र हो कर इसका फायदा उठाते हैं | गुनाह करनेवाले किसी को कानून का डर नहीं है, उलटा न्याय पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले को कानून की इस शिथिलता का डर है, क्यों कि यहां तो बस न्याय के नाम पर “तारिख पर तारिख” के सिलसिले के साथ साथ अनेक दसकों तक केस चलता ही रहता है |

देश को गुनहगार और ठगों से मुक्त करना हो, तो अंग्रेझों के समय से चली आ रही इस हास्यास्पद न्यायव्यवस्था में भारी सुधार आवश्यक हैं |

सिस्टम और प्रोसेस में तालमेल से ही कार्यक्षमता बढ़ सकती है |

हमारी सरकारी ओफिसों में करोडों रुपये खर्च कर के Information Technology की आधुनिक सिस्टम्स लगाइं जातीं हैं लेकिन फिर भी गलत प्रोसेसींग-गलत कार्यपद्धति की वजह से आम जनता के समय की कोइ बचत या तकलिफों में कमी होती नहीं है, उसका जीवंत उदाहरण है पासपोर्ट सेवा केन्द्र |

पासपोर्ट एप्लीकेशन के प्रोसेसींग का काम प्राइवेट कंपनी Tata Consultancy Services-TCS को दिया को दिया गया है |
अलबत्त TCS की सिस्टम की वजह से काउन्टर पर पहुंचने के बाद काम त्वरा से होता है, पासपोर्ट सेवा केन्द्र में TCS के कर्मचारियों का काम, बर्ताव, ट्रेनिंग प्रशंसनिय है | उसी पासपोर्ट केेन्द्र में अभी भी बाकी के कुछ कामों के लिए सरकारी कर्मचारी ही हैं, और TCS के काम करने के तरिके का रंग उनके उपर कथ्थई नहीं चढ़ा है | भारत में सरकारी कर्मचारियों के पास से TCS जैसे काम की उम्मीद भी नहीं रख सकते |

TCS की  वजह से काम सिस्टेमेटीक जरुर हुआ है, पर पूरी प्रक्रिया-प्रोसेसींग में कहीं तो बहोत बडा fault है | इसी वजह से पासपोर्ट केन्द्रों में जनसमुदाय के समय का अधिक व्यय होता है |

मुंबइ-मलाड स्थित पासपोर्ट सेवा केन्द्र में मैंने स्व-अनुभव किया है कि पासपोर्ट प्रक्रिया के लिए बनाये गये चार काउन्टरों पर टोटल १५-२० मिनिट का ही समय ही लगता है | पासपोर्ट सेवा केन्द्र में जाने के लिए पहले से appointment दी जाती है | लेकिन फिर भी एक व्यक्ति को चार काउन्टर पर काम पूरा करने में कम से कम 3 घंटों का समय केन्द्र में लगता ही है | क्यों कि सब को अलग-अलग ७ जगहों पर अपना नंबर आने का इन्तज़ार करना पडता है |

इस कारण हर व्यक्ति के करिब २.५ घंटे व्यय होते है | एक दिन में ३०० लोग एक केन्द्र में आते हैं | हर दिन ऐसा एक केन्द्र करिब १०० working days के व्यय का कारण बनता है |

क्यों?

क्यों कि पासपोर्ट संबंधी प्रक्रिया के बारे में सही तरिके से स्टडी नहीं हुआ है |

एक तो appointment के लिए समय देने का तरिका गलत है | १५ मिनिट के स्लोट में एक साथ १५-२० लोगों को एक समय पर बुलाया जाता है | हर अर्जदार को कुल मिला के अलग इलग चार काउन्टरों पर जाना पडता है |

इस का मतलब है कि केन्द्र की चारों प्रोसेस के काउन्टर्स १५ मिनिट में १५-२० लोगों को हेन्डल कर लेने चाहिए | पर सब से पहले काउन्टर पर ही ऐसा नहीं होता है | चार काउन्टर में से सब से पहले काउन्टर पर सब से ज्यादा समय लगता है | और चार में से यह पहले काउन्टरों पर ही मेनपावर सब से कम है | अंदर के २-३-४ (A-B-C) काउन्टरों पर अनेक गुना मेनपावर है | परंतु यहां तक पहुंचने के लिए screening करनेवाले पहले काउन्टर पर सब से ज्यादा समय लगता है, और उन पर ही मेनपावर कम है | यह बोटल-नेक का typical example है |

कार्यक्षमता (Efficiency) बढ़ाने के लिए सिस्टम और प्रोसेस-कार्यपद्धति का तालमेल सही होना चाहिए | TCS या इस प्रोसेस की Design  में शामिल एजन्सी अगर प्रोसेस के अमलीकरण में प्रेक्टीकल Bottleneck का अभ्यास कर के उन  में सुधार जब तक नहीं करेगी तब तक बडी बडी सिस्टम्स लगाने के बाद भी २० मिनिट के काम के लिए ३ घंटे पब्लिक को बिताने ही पडेंगे |

मेनेजमेन्ट का ओवरडोझ कस्टमर के अनुभव को कडवा कर सकता है… Over management results in bad customer experience

मेनेजमेन्ट-सिस्टम्स-प्रोसेस यह सारी बातें सही हैं लेकिन उनका Overdose या गलत अमलीकरण कभी कभी कंपनी के नुकसान का या उस के पतन का कारण बन सकते हैं| Over management का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत है|

मुंबइ के झवेरी बजारमें एक पुराने समय से विख्यात एक मीठाई की दुकान है| उनकी मुंबइ के अलावा अहमदाबाद में भी शाखा है|
दुकान काफी पुरानी है और उनका बडा अच्छा नाम है|
पुराने समय की सफलता के आधार पर ग्राहकों की बडी संख्या को attend करने के लिए कंपनी के मेनेजमेन्ट ने कुछ कार्य विभाजन की सिस्टम लगाई हुई है|

वहां एक कर्मचारी ओर्डर लेता है, दूसरा बील बनाता है, तीसरा बोक्स निकालता है, चौथा मीठाइ निकाल के उसका वजन करता है, पांचवां बोक्स को पैक करता है, छठा उस बोक्स को प्लास्टिक बैग में डाल कर काउन्टर पर छोड देता है, सातवां पैसा लेता है और तीन-चार लोग यह सारा नजारा देखते रहते है|

किसी भी घडी आप इस दुकान में जाओगे तो ग्राहकों से तीन गुना स्टाफ पाओगे|

इतना सारा स्टाफ होने के बाद भी बील बनाने वाले के पास से बील केश-काउन्टर तक कस्टमर को ही ले कर जाना पडता है| और फिर पैसा देने के बाद वापस काउन्टर तक जा कर कस्टमर को ही अपना खरीदा सामान उठाने जाना पडता है|
उस में भी अगर दो या तीन कस्टमर एक साथ आ गये तो उधर धमाल-full chaos हो जाती है|

इतना overstaffing और over management होते हुए भी कस्टमर को अच्छी सर्विस या अच्छा अनुभव कराने में यह दुकान सरियाम निष्फल जा रही है|

Management अगर ज्यादा और बिना सोचे समझे होता है तो उस के विपरीत परिणाम भी आ सकते है|
मीठाई की famous दुकान भी कस्टमर को कडवा अनुभव करा सकती है|

Is chilling AC killing productivity in your office?

Recently, Manoj had to take two weeks of sick leave due to pneumonia. This was his third such sick leave in last three years, all the times due to pneumonia. I met him during the recent illness and asked him “Why are you getting repeated attacks of pneumonia? What are the doctors saying?” Manoj said “Pneumonia is repeating due to over exposure to AC.” Then, he described “In our office, ACs are kept at very low temperatures. It is centralized AC and so, we can’t control it at our work desks or cabins. Many of us are troubled by this and fall sick very often, but there does not seem to be any solution to this. Our admin department is not able to recognize this as a problem. When we ask them to keep temperature at 22 or 23 degrees, they brush aside our request saying ‘Others feel hot. Hum ko kitne logon ka sunne ka??’. We are suffering due to this apathy.”

This is an obviously a simple thing, but many companies are completely oblivious of this problem. And under this cold attack, their people are being affected adversely crippling their productivity and health, losing valuable time and efficiency.

Many big public buildings have centralized AC systems.  In auditoriums and banquet halls, people are seen freezing under chilling temperatures. The attendants express their helplessness to control it. In office environment, centralized AC needs proper design and sensible monitoring of temperature levels.

There are obviously damaging effects of too low AC temperatures but somehow so many companies ignore this fact, may be unknowingly.

1) Increased exposure to artificially low temperatures, affects body rhythm adversely. it has numbing effect and people fall sick often.

2) To combat the effects of AC, consumption of Tea, Coffee increase significantly. Similarly, water intake reduces. This has its own undesirable consequences.

3) When people go out of this AC environment where outside temperature is higher. body’s thermal adjustment goes for a spin. Such suddenly confusing patterns are invitation to health problems.

4) There are well-known environmental effects of AC, contributing to  warming of outside surroundings. Even electricity companies suggest keeping AC temperatures to 24 degrees, only if we wish to pay attention.

There was a time when having an AC office was a matter of pride and people used to keep AC at the lowest temperature as if to take revenge of all the hot days they had spent earlier. I think now we should realize the damaging effects of this hidden productivity killer in our offices.