“Ullu Banaving” – Manipulative Pricing gets punished

Some organizations are notorious for misleading pricing claims. Publisher of India’s leading English daily The Times Of India frequently comes out with misleading pricing claims. I received a call from Times group’s magazine distribution company saying “On one year subscription, we offer 50% discount. The newsstand price is 1440. But we charge only 840.” I asked “But then it is not 50% discount. 50% of 1440 is 720.” “Yes sir. We add Rs.120 as delivery charge. Rs 10 per issue.” They may be right in claiming that delivery charge, but to the customer whatever she pays is the final price. So, 840 instead of 1440 is 41.67%. It is not 50%.

Then why should they claim it and try to mislead the customer? It is bad customer experience.

No wonder Times’ magazine portfolio sucks. Customer does not forgive Ullu Banaving manipulative pricing.

पान की दुकान से कस्टमर सर्विस के पाठ

किसी पान वाले की दुकान पर आप गये होंगे तो आप ने कुछ ऐसा अनुभव किया होगा |
१) उस के पास आनेवाले कस्टमरों को वह क्रम अनुसार ही attend करता है | पान या मावा बनाते वक्त कोइ सिगरेट-गुटखा वगैरह खरिदने को आता है तो उस को wait करना पडता है | अन्य जगहों पर उतावल से, जल्दी सर्विस की डीमान्ड करने वाला कस्टमर भी यहां मजबूरी से wait करता है | पानवाला अपने कस्टमर की सायकोलोजी अच्छी तरह से समझता है | जो अपनी तंबाकु-गुटखा-सिगरेट वगैरह की आदत से मजबूर होते हैं ऐसे weak-कमजोर लोग ही वहां आते हैं| ऐसे मजबूर लोगों के पास और कोइ विकल्प ही नहीं है, इस लिए वह वहां इन्तज़ार करेंगे, कहीं नहीं जायेंगे |
पान वाले के पास से कस्टमर सर्विस का पहला पाठ : अपने कस्टमर की सायकोलोजी को समझो | उस अभ्यास के अनुसार उस के साथ बर्ताव करो |

२) हर ग्राहक का एक “खानदानी” पानवाला होता है| उस को कैसा पान-मावा चाहिए यह पानवाला खास से याद रखता है| और कस्टमर को इस बात का अपूर्व गर्व होता है| इसी वजह से कस्टमर पानवाले को छोडता नहीं है|

पान वाले के पास से कस्टमर सर्विस का दूसरा पाठ : अपने कस्टमर की पसंद-नापसंद पर ध्यान दें | ग्राहक को आप का व्यक्तिगत ध्यान प्राप्त होगा तो वह आप का साथ कभी भी नहीं छोडेगा…

३) पानवाले के पास से कस्टमर को हमेशा वही क्वोलिटी मिलती है, हर एक चीज़ की सही मात्रा, प्रमाण सब कुछ वैसा ही हमेशा मिलता है, इसी लिए कस्टमर उस पानवाले को छोडता नहीं है|
पान वाले के पास से कस्टमर सर्विस का तीसरा पाठ : Be consistent. कस्टमर को हमेशा वही क्वोलिटी मिले वह खास ध्यान दें|

सिर्फ चीज़ें या वस्तुएं ही नहीं बिकती, उनको बेचने का तरीका भी उतना ही अहमियत रखता है|

किसी विख्यात ब्रान्ड की फ्रेन्चाइझी लेनेवाले के मन में यह आश रहती है की पैसा डाल दिया, फ्रेन्चाइझी ले ली अब तो बस चांदी ही चांदी है| अब तो ब्रान्ड के चाहक ग्राहक ढूंढते-भागते हमारे पास आयेंगे…|

लेकिन ऐसा हमेशा होता नहीं है|
मुंबइ के जुहु में एक ख्यातनाम आईस्क्रीम पार्लर है| उस की सफलता से प्रेरित कंपनीने बहोत सारे फ्रेन्चाइझी पार्लरों के द्वारा अपना विकास करना चाहा| जुहु की आईस्क्रीम का टेस्ट जीस को अच्छा लगा होगा वह कस्टमर को वही क्वोलिटी, वही फ्लेवर्स, वही कोन-कप उन्हीं दामों पर अपने घर के करिब मिलेंगे तो वह खुशी-खुशी वहां जाएगा ऐसा कंपनी के मार्केटींग डीपार्टमेन्ट ने सोचा और मालिकों को भी यह सही लगा होगा | लेकिन उन में से काफी सारे पार्लर ठीक नहीं चल रहे हैं|
कारण?
१) कुछ पार्लर गलत लोकेशन्स पर हैं, जहां कस्टमरों के लिए आना मुश्किल है|
२) पार्लर के कुछ फ्रेन्चाइझी अपनी लालच के वश में पैसा बचाने के चक्कर में कस्टमर को अच्छी सेवा-सुविधा देने से कतराते हैं| इन के मलाड-वेस्ट सब-वे के पास स्थित पार्लर में आप जायेंगे तो आप को ऐसा नकारात्मक अनुभव होगा|

परिणाम?
लोगों को प्रोडक्ट या ब्रान्ड तो वही मिल रही है, लेकिन अनुभव वही नहीं हो रहा है|

सिर्फ चीज़ें या वस्तुएं ही नहीं बिकती, उनको बेचने का तरीका और कस्टमर का अनुभव भी उतना ही अहमियत रखता है|

अगर कोई ब्रान्ड सिर्फ पैसे देखकर किसी को भी अपना फ्रेन्चाइझी बना देगी और उस के नैतिक मूल्य ब्रान्ड की ईमेज से विपरीत होंगे, कस्टमर को अच्छा अनुभव नहीं होगा, तो अंत में वह फ्रेन्चाइझी भी निष्फलता प्राप्त करेगा और उस ब्रान्ड को भी उस फ्रेन्चाइझी की लालच की वजह से नुकसान ही होगा़…

It is not only the product or brand that sells

Only a strong brand is not enough to succeed. Along with “what” we are selling, “how” and “where” we are selling that also matters.

It is not only the product or brand that pulls the customers. Customer Experience counts.

If along with the product and its brand name the selling process is not transferred with the brand’s true spirit, all the franchisees of a product don’t get the same response because the customer experience is not duplicated everywhere. Here is an example.

Even though Juhu’s famous Ice Cream brand has its franchisee parlors at many places in Mumbai and elsewhere, only the flagship one at Juhu is always very crowded. Others are not so successful. Some are complete failures. Reasons?
1. Location plays a very important role. Some parlors are in very inconvenient locations, which people don’t like to frequent.
2. Service and Customer Experience are most important than the brand or the product itself. At their franchisee store in Malad-West, for example, customers don’t feel welcome. The franchisee owners are very greedy and the staff completely unprofessional, making a customer’s experience unsavory in contrast to the brand’s tasteful reputation.

It is not only the product or brand that sells. The process of selling and customer experience also affects sales equally.

Along with financial strength of a franchisee, their value system also must be examined. Otherwise their association will damage the brand’s image.

मेनेजमेन्ट का ओवरडोझ कस्टमर के अनुभव को कडवा कर सकता है… Over management results in bad customer experience

मेनेजमेन्ट-सिस्टम्स-प्रोसेस यह सारी बातें सही हैं लेकिन उनका Overdose या गलत अमलीकरण कभी कभी कंपनी के नुकसान का या उस के पतन का कारण बन सकते हैं| Over management का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत है|

मुंबइ के झवेरी बजारमें एक पुराने समय से विख्यात एक मीठाई की दुकान है| उनकी मुंबइ के अलावा अहमदाबाद में भी शाखा है|
दुकान काफी पुरानी है और उनका बडा अच्छा नाम है|
पुराने समय की सफलता के आधार पर ग्राहकों की बडी संख्या को attend करने के लिए कंपनी के मेनेजमेन्ट ने कुछ कार्य विभाजन की सिस्टम लगाई हुई है|

वहां एक कर्मचारी ओर्डर लेता है, दूसरा बील बनाता है, तीसरा बोक्स निकालता है, चौथा मीठाइ निकाल के उसका वजन करता है, पांचवां बोक्स को पैक करता है, छठा उस बोक्स को प्लास्टिक बैग में डाल कर काउन्टर पर छोड देता है, सातवां पैसा लेता है और तीन-चार लोग यह सारा नजारा देखते रहते है|

किसी भी घडी आप इस दुकान में जाओगे तो ग्राहकों से तीन गुना स्टाफ पाओगे|

इतना सारा स्टाफ होने के बाद भी बील बनाने वाले के पास से बील केश-काउन्टर तक कस्टमर को ही ले कर जाना पडता है| और फिर पैसा देने के बाद वापस काउन्टर तक जा कर कस्टमर को ही अपना खरीदा सामान उठाने जाना पडता है|
उस में भी अगर दो या तीन कस्टमर एक साथ आ गये तो उधर धमाल-full chaos हो जाती है|

इतना overstaffing और over management होते हुए भी कस्टमर को अच्छी सर्विस या अच्छा अनुभव कराने में यह दुकान सरियाम निष्फल जा रही है|

Management अगर ज्यादा और बिना सोचे समझे होता है तो उस के विपरीत परिणाम भी आ सकते है|
मीठाई की famous दुकान भी कस्टमर को कडवा अनुभव करा सकती है|

Indian Railways’ Bad design = Bad Customer Experience # 1

Indian Railways (and many other Indian Government departments) have a large number of Einsteins sitting in their dusty offices. These Einsteins come out with innovative designs and process solutions which, instead of improving the quality of service, increase the hardships and troubles of the passengers.

Railways has installed some modern escalators at local train stations in Mumbai. At Dadar, one such swanky escalator on platform no.2 on Western side is not much used by people. It is always deserted. Very few people use it preferring the staircase next. Why is this so in a heavily crowded station like Dadar, where people should have loved to use such modern facility?

The escalator leads to a foot over bridge which is truncated up to Western side only. The unassuming people willing to go to East side or Central Railway who climb up the escalator have to first climb down from that bridge and climb up stairs all the way again….! Result ? The escalator is useless for 70% of the commuters.

Some among the Einsteins should have seen the place before coming out with such half-baked modern solution wasting huge amount of time, money and energy. Bad designs result into bad customer experience. At least we should learn this from the wasteful expenditure of our government.

These Einsteins don’t have to pay from their pockets so they can afford all such idiosyncrasies.
We can’t.

What confuses our customers?

Gujarati Thali is a very simple, hassle free format for savoring a wide range of delicacies in an efficient, prompt and convenient way.

It has a fixed price, fixed menu and unlimited food. You can eat anything to your satisfaction from a wide range of dishes on the menu.

Ahmedabad has some very good Thali restaurants. Almodt all of them follow the same model. Fixed price. Fixed menu. Unlimited food.

Gopi is one of the oldest near V S Hospital. Recently, a visit there and the confusion thereof left a not very savory aftertaste.

Once there, we were asked “Fixed or unlimited Thali?”

Then next question was “Kathiawadi” or “Gujarati”?

Then “Which out of the 4 sweets? You can choose any one out of 4.”

For the 6 of us who had gone there for dinner, the next 45 minutes were full of confusion because each had selected a different variant of combinations available.

Companies needlessly come out with creative ways to create complexity out of simplicity and make the customer’s experience unappetizing.

Actually, a fixed menu with 3-4 sweets available to all really does not increase cost to the company significantly.

Here, I remember one profound consumer insight a restaurant owner shared with me. He said “Whether there are 8 items on the menu or 40, a person can eat around 400 grams of food. So, adding or reducing items on menu does not make much difference to the cost if there is some minimum volume in the business.”

Gopi should realize that dividing menu and sweets and confusing the customer results in bad Customer Experience in the end without adding anything to profit.

Give more choice. But reduce complexity and confusion. Many of your new competitors are doing it profitably.

The award for the inefficiency goes to…

If you wish to see an example of the most ineffective way to communicate, just listen to the railway announcement at any railway station in India. Almost nothing will make sense. The equipment will be faulty. Volume – wrong. Speaker’s attitude – horrible.

The universality of the most idiotic and confusing manner in which they speak at almost every station in India gives rise to an assumption that they all are trained in the worst way a commnication job can be done.

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ICICI Bank, don’t make your customers’ life more difficult

Even when companies deploy latest technology which can make customer’s life really easy, the same companies can find ingenious ways to unnecessarily irritate a customer and make their experience unhappy.

ICICIBank.com’s Netbanking has a weird virtual keybaord layout instead of the traditional and highly familiar ‘qwerty’ layout. What is the logic behind this stupid design of keyboard layout which keeps the customer fumbling for keys?

The Account Summary statement display has the same column for Cr and Dr. So you keep searching what is Deposited and what is Withdrawn. How much time does it take to write few lines of software code to separate two columns for Cr and Dr or Deposit and Withdrawal? And contrast it with how much time it will save for your customers?

ICICI Bank, is this your way to prove you have “Khayal Aaap ka” in your approach?

Bad. Grow up.

The manner of speaking matters

Heard two back-to-back announcements by two airlines announcing departures of their flights at Ahmedabad airport.

The lady announcer of IndiGo started “IndiGo announces the departure of its flight to Mumbai….”, spoke the name ‘IndiGo’ in a very low and unclear voice only once in the beginning of a rather long announcement, which is generally missed by the passengers as they are not able to hear initial words, due to the sudden start of the announcement.
Result? Total confusion for most of the passengers as for which airline the announcement was.

Next announcement was from SpiceJet. The lady started with “Kind Attention SpiceJetters…This is an announcement for passengers traveling by SpiceJet flight number xyz…”. Also, she spoke the word ‘SpiceJet’ 4 times clearly and loudly in the same amount of time.
Result? Total clarity about for whom the announcement was.

At a terminal where 5-6 airlines operate flights to a small number of destinations, the name of the airlines deserves the most clear mention.

Common sense, no?
But common sense is not common, no?

SpiceJet makes it loud and clear. IndiGo needs to improve skills on meaningful communication where it matters.

To be aware of the effect of our communication, we should hear through the ears of our customers.