भारत में न्याय व्यवस्था क्यों अर्थहीन हो गई है ?

१९७३ में दिल्ही की सीटी बस DTC का एक कन्डक्टर एक महिला पेसेन्जर को १५ के बदले १० पैसों की टिकिट देता है | चेकींग स्कवोड इसे पकडती है | डीपार्टमेन्ट इन्कवायरी शुरु होती है |

१९७६ में इन्कवायरी का रीपोर्ट आया, उसे नौकरी से निकाला गया | उसने लेबर कोर्ट में अपील की |

१९९० में लेबर कोर्ट का फैसला आता है | उस कन्डक्टर को वापस काम पर लेने का आदेश DTC को दिया जाता है | DTC हाइकोर्ट में अपील करती है |

२००८ में हाइकोर्ट DTC की अपील नकारती है | DTC फिर से Review Petition दाखिल करती है |

और अब मामला शुरु होने के ४१ सालों के बाद २०१४ में उसकी सुनवाई हो रही है |

नोंधनीय बात मात्र यही नहीं है कि ५ पैसों के मामले का केस ४१ सालों से चल रहा है, किंतु यह साबित करता है की भारत की न्याय व्यवस्था कितनी हास्यास्पद और अर्थहीन है |

ऐसी न्याय व्यवस्था के कारण ही देश में मुझरिम गुनाह करने के बाद भी बिना रोक-टोक घुमते रहते हैं | जिसे कानून की अर्थहीनता का पता चल गया है, वह बेफिक्र हो कर इसका फायदा उठाते हैं | गुनाह करनेवाले किसी को कानून का डर नहीं है, उलटा न्याय पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले को कानून की इस शिथिलता का डर है, क्यों कि यहां तो बस न्याय के नाम पर “तारिख पर तारिख” के सिलसिले के साथ साथ अनेक दसकों तक केस चलता ही रहता है |

देश को गुनहगार और ठगों से मुक्त करना हो, तो अंग्रेझों के समय से चली आ रही इस हास्यास्पद न्यायव्यवस्था में भारी सुधार आवश्यक हैं |