No, HDFC Bank, you don’t understand our World…

Here are some consumer insights which may help you to lend meaning to your tagline : “We understand your world”.

1) In our world, when we call up the branch (at given number in the passbook), we expect some human being to speak to us. Not a AVRS taking us through a range of meaningless options and then leading nowhere.

2) If you decide to send us the passbook and print it, we expected it to print the initial pages with the current balance also. Why do you expect us to go to the bank for getting it updated for the first time, when the data is already there in your system when you printed our passbook? Think logically, marketing guys…!

3) In our real world, we don’t carry HUF debit card (because we said we did not want it, in the first place), even if it comes FREE. You send us a FREE debit card and then you force us to enter Debit card and its PIN number in various transactions which could have been designed some other way.

4) In real world, we don’t carry following things, all together :

  • Bank Account Number
  • Your Customer ID (TWO in case of HUF)
  • Your NetBanking Password
  • Your TPIN (Phone Banking PIN)
  • Your Debit Card Number
  • Your Debit Card ATM PIN number

No we dont’t.

5) In our real world, when we go to our bank to deposit cash, the Receiving Cashier does not treat us as if we are the reason for her Bad Hair Day, and angrily ask us to provide “Source” for a deposit of few thousand rupees. It could be a formality, but your Cashiers could behave a little more friendly, if you really Understood Our World.

6) In our real world in our Credit Card statements, the name that we should write on cheques for Credit Card payment should be written in normal sized letters. Currently, you can’t read it with Magnifying glass also.

7) The space for writing name in your Deposit Slips is illogically less. In our real world, this space should be bigger.

8) When we are sold the Credit Card, the bank RM and some other sales people follow up a lot, but after that, for making payment for the same Credit Card, the branch does not have much support other than a drop box to drop cheques. Any grievance, concern regarding the Credit Card has to be handled by the customer himself/herself. In real world, the customer is same when you sold him the card and after that. You may turn your back towards him, but he does not forget that.

This is how HDFC Bank makes it impossible to work with them?

I have been a fan of HDFC Bank, but recently, the services and their operating processes are going from bad to worse.

Some examples of their illogical ways of working :

1) They changed Relationship Manager, without the customer knowing. It is only when the customer calls the old RM, he is told that now somebody else is your RM.

2) You are forced to use NetBanking. For activating NetBanking for my HUF account required me to go to Bank branch 3 times, every time RM telling new things (which he never told earlier). My experience with RM Abhishek Utekar has not been very good at Malad-East branch, he was never concerned about the customer’s problems.

3) The NetBanking password which comes in a very Private and Confidential does not have the word HUF written anywhere on the letter. It is common sense that an Individual account and an HUF account have rest of the things common. So, the word HUF is most important in the communication. But, common sense is not common in HDFC Bank.

4) You are given a CustomerID for accessing NetBanking. You try accessing it and you will be thrown back by the system citing invalid ID. You are told by RM that for HUF accounts, the CustomerID to be entered is the next sequential number coming after your CustomerID. (Now unless a customer dreams about this, this is never communicated by HDFC Bank, formally. I believe the think that the customer will dream their weird processes.)

5) Their new Passbook has the “Branch Tel No. : 022-61606161″. You call it up and it will take you through elaborate instructions, finally asking you your CustomerID, your TPIN number, etc. etc. You think you are calling up the branch, but you end up calling some Call Centre somewhere. How funny?

6) After somehow getting the correct CusomterID and password, you login but to discover that ‘Your NetBanking has been disabled.” There is a link to enable it, but does not work (I am not surprised now.)

7) I have understood that HDFC Bank believes that you carry your following things always with you (even when you are in some emergency), so that you can bank with them (SMOOTHLY…!!!) :

  • Bank Account Number
  • Your Customer ID
  • Your NetBanking Password
  • Your TPIN (Telephone Banking PIN)
  • Your Debit Card Number
  • Your Debit Card ATM PIN number

8) So much to support HDFC Bank’s tagline : “We understand your world.”

Do you, HDFC Bank?




नरेन्द्र मोदी कैसे सफल हो सकेंगे?

हमने नरेन्द्र मोदी पर बडी आश तो लगाइ है, लेकिन क्या मोदी साहब के पास कोई जादुई छड़ी है की वह उसे घुमायेंगे और सब कुछ ठीक हो जायेगा?

अगर भारत को आगे बढ़ाना है, तो सवा सौ करोड जनता के इस देश के नागरिकों को भी कुछ करना पडेगा |

सरकारी नौकरों के एश-ओ-आराम तथा politicians के बेसुमार धन-दौलत-जाहोजलाली का उदाहरण देखकर हम में से कई लोगों को भी काम न कर के पैसा कमाने की लालच लगी है | भारत के कुछ लोगों की सोच भी सरकारी हो गई है | दूसरी ओर आजकल हार्डवर्क के बदले “स्मार्ट वर्क” का ट्रेन्ड चला है | सब जगह कम से कम महेनत कर के “येनकेन प्रकारेण” ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की रेस लगी है | यह खतरनाक आदत बदलनी होगी |

आठ घंटों के ओफिस समय में आधा घंटा देर से आना, फिर आधा घंटा चाय-पानी और इधर-उधर टाइम-पास करना | १ घंटे का लंच-टाइम लेना और बिच में दो-तीन टी-ब्रेक लेना | छूटने के समय से आधे घंटे पहले ही इस की तैयारी में लग जाना | बाकी के समय भी ओवरटाइम और छूट्टीयां कितनी मिलेंगी इस की फिक्र में लगे रहना | किसी भी ओफिस में ऐसे सरकारी attitude वाले, सदैव घडी और कैलन्डर  देखकर काम का नाटक करनेवाले character मिलेंगे | ऐसी मानसिकता प्रगति की नहीं, बल्की अधोगति की निशानी है |

कुछ बिझनेसमेनों में भी कस्टमर को cheat करके, उसे उल्लु बनाकर किसी भी तरह उसे अपनी चीज़ चीपकाके “मलाई” खा कर अपनी होशियारी साबित करने की होड लगी है | सरकार के टैक्स जमा नहीं करना, लांच-रिशवत दे कर के, गलत तरिकों से पैसा कमाना, काला धन जमा कर के देश के प्रति अपना रुण अदा नहीं करना यह भी सरकारी attitude से कम नहीं है |

किसी भी देश की प्रगति का आधार अधिकांश वह कितनी प्रोडक्ट या सर्विस उपलब्ध करा सकता है, उस के उपर है | अगर हमें आगे बढना है, तो कम से कम काम कर के ज्यादा से ज्यादा पैसा एंटने का कामचोरी का सरकारी attitude बदलना होगा | काम के प्रति हमारा रवैया बदलना होगा | हमारी आलस दूर करनी होगी | अपने समय का पालन करना होगा | हमारे जीवन में Discipline लाना होगा |

अगर हम ऐसा नहीं कर सकेंगे, तो नरेन्द्र मोदी साहब नाम की जादुई छडी भी कुछ नहीं कर सकेगी |

एक सामान्य भारतीय का श्री नरेन्द्र मोदी को खुला निवेदन पत्र

आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी साहब,

सादर प्रणाम |

भारत देश का एक सामान्य नागरिक भी अपनी महेनत, मनोबल और महत्त्वाकांक्षा के बल पर सर्वोत्तम स्थान पर पहुंच सकता है, इस बात का ज्वलंत प्रमाण पेश कर ने के लिए आप को हार्दिक अभिनंदन तथा इस देश में सुराज्य लाने के आप के संकल्प और प्रयासों की सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं |

आप को यह पत्र लिखने की प्रेरणा मुझे मिली है उस आशा से जो आप के आगमन ने मेरे जैसे करोडों सामान्य भारतवासियों के मन में जगाई है | राजनीति और politicians पर से हम भारतवासियों का भरोसा उठ गया था, जो आपने पुन:स्थापित किया है |

भारत की विकासयात्रा को सही पटरी पर लाने के लिए अाप को बहुत सारे और बहुत बड़े काम करने हैं | और आप सारी कोशिशें करेंगे ऐसा हमें विश्वास है | लेकिन इन बड़े कामों की योजना बनाते वक्त आप हमारे जैसे करोड़ों छोटे लोगों के जीवन की समस्याओं पर थोडा गौर करके इन समस्याओं को सुलझाने के हेतु को केन्द्र में रखकर सरकार की नीतियां बनायेंगे, तो आप के आगमन से पैदा हुइ आश साकार स्वरुप ले पाएगी | मैं और मेरे जैसे भारतवर्ष के अन्य सामान्य नागरिकों की आप से कुछ अपेक्षाएं हैं, जो मैं यहां प्रतिघोषित करता हुं |

१) किसी भी सरकारी डीपार्टमेन्ट से छोटा या बडा कोई भी काम कराना हो तो भारत में किसी ना किसी सरकारी अफ्सर या politician को पैसा देकर “सेटींग” करनी ही पडती है | एक बार एक किसी पावरफूल व्यक्ति के साथ “सेटींग” हो गइ फिर फटाफट काम होने लगता है | भारत की यह अनोखी Single Window Clearing System, यह “सेटींग” बिझनेस, बन्द हो और योग्यता अनुसार काम हो ऐसी अपेक्षा |

२) बचपन से ही भारतवासीयों को पुलिस से डरने का सिखाया गया है | भारत के politicians इस डर को अच्छी तरह से समझ गये हैं और लोगों को डराकर अपना काम कराने के लिए पुलिस को use करते हैं | नीडर भारत के लिए निष्पक्ष पुलिस की आवश्यकता है | पुलिस को politicians के डर से मुक्ति मिलेगी तो ही पब्लिक को पुलिस के डर से मुक्ति मिलेगी | सामान्य भारतवासी को खुद को हुए अन्याय की फरियाद करनेे के लिए पुलिस स्टेशन तक जाने में जो डर लगता है, उस डर को दूर करने का निवेदन |

३) कोइ भी व्यक्ति अपना १००% तभी दे सकता है, जब वह भयमुक्त हो | लोगों को सरकार से यह अभयदान मिल सकता है, लेकिन आज पुलिस या कोइ भी सरकारी अमलदार खुद ही आमजनता को डराकर, भयभीत करके उनका फायदा उठाते हैं | हर राज्य में एक कोमन फोन-नंबर की हेल्प-लाइन देकर लोगों को किसी भी सरकारी अमलदार से भयमुक्ति दिलायें ऐसी प्रार्थना |

४) जनता को हेल्प करने के लिए हम अलग-अलग प्रकार की हेल्प-लाईन तो चालु कर डालते हैं, लेकिन कुछ महिनों बाद उसे attend करनेवाला ही कोइ नहीं होता | अगर होता है, तो वह कोइ गुस्सेवाला भूखा-प्यासा, पीडित आदमी होता है, जो हेल्प कम करता है, भौंकता ज्यादा है | हेल्प-लाइन पर बिच-बिच में फोन कर के वह सो न जाय ऐसी व्यवस्था हो तो सही मदद होगी |

५) दूसरा डरावना शब्द है Taxes | एक तो अनेक प्रकार के टैक्ष और उपर से उनका पेपरवर्क | टैक्ष के सारे कायदे कानून इतने पेचीदे हैं की उन सब का पालन करना अत्यंत मुश्किल है | टैक्ष की पूरी प्रक्रिया को सरल बनाना जरुरी है | दूसरी यह मान्यता की सरकार को टेक्ष देंगे तो ९०% हिस्सा politicians और सरकारी कर्मचारी “खा” जाएंगे | यह खाना-पीना बन्द हो और जनता से मिले टैक्स का सही उपयोग हो ऐसी गुज़ारीश |

६) भारत में सरकार कोइ भी प्रोजेक्ट के पीछे १०० रुपये खर्चेगी तो उस में से २५ रुपयों का ही काम होगा ऐसी मान्यता है | बाकी की रकम अनेक जरुरतमंद लाभार्थी लोगों में बंट जाएगी | यह जरुरतमंदों में बंटवारा बन्द हो और पूरी रकम नियत प्रोजेक्ट पर खर्च हो ऐसी पारदर्शक व्यवस्था करने की प्रार्थना | हमारा देश गरीब नहीं है, लेकिन सरकार-Politicians और सरकारी कर्मचारियों के लोभ-लालच की वजह से बहुत धन लीकैज हो रहा है | इस लीकैज को त्वरा से भरें |

७) कश्मीर के ओमर अब्दुल्लाह जब राजनीति में आये तब एक टी.वी. इन्टरव्यू में उन्होंने कहा था “मेरे पिताने कहा कि पोलिटीक्स एक अच्छी लाईन है, इस लिए मैंने राजनीति में आने का निर्णय लिया |” शायद ओमर अब्दुल्लाह उस वक्त नासमज थे इस लिए उनके दिल की बात ज़बान पर आ गई | लेकिन अकेले फारुक अब्दुल्लाह ही नहीं, भारत के सारे politicians राजनीति को Profession नहीं लेकिन एक Business मानते हैं, और ज्यादातर किस्सों में देश और उसकी प्रजा को लूटने का कारोबार चलाते हैं | यह धन्दा बन्द करें |

८) किसी भी सरकारी अस्पताल में सारी सुविधाओंका बजेट पास होते हुए भी आम जनता को सही ट्रीटमेन्ट नहीं मिल सकती | सरकारी अस्पताल world class सुविधा और सर्विस दे पायें ऐसी व्यवस्था की अभिलाषा |

९) सफाई के लिए जरुरत से ज्यादा स्टाफ और साधन होते हुए भी हमारे देश का कोई भी जाहीर स्थल हमेशा गंदा ही रहता है | रेल्वे-बस स्टेशन, होस्पिटल्स, स्कूल्स, सरकारी दफ्तर, राह-रस्ते, गार्डन सब कुछ एरपोर्ट की तरह साफ-सुथरा और चकाचक रखने का बजेट तो पास हो जाता है, लेकिन काम नहीं होता | सिर्फ बजेट ही नहीं, काम भी उसी क्वोलिटी का हो यह देखें | इस परिस्थिति में १००% सुधार संभव भी है, और अपेक्षित भी है |

१०) कोई भी सरकारी नौकरी मतलब “चांदी” | सरकारी नौकरी मतलब बिना काम किये पैसा कमाने का लाइसन्स | सरकारी नौकरी मतलब “उपर की कमाई” का अविरत स्त्रोत | सरकारी नौकरी सब से पहले एक सेवा कार्य है, और अपने कार्य से देश की सेवा कर के रोजगार पाने का एक प्रामाणिक ज़रिया है, यह भावना सरकारी दामादों के मन में जाग्रत हो ऐसे ठोस कदम की अपेक्षा |

११) सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले अफ्सरों को यहां-वहां तबादला कराने की और उनका promotion करने की सत्ता politicians के पास होने से अफ्सर खुले मन से काम नहीं कर सकता | वह डरा हुआ रहता है | अफ्सरों की भर्ती, तबादले या प्रमोशन को योग्यता के आधार पर पारदर्शक बनायें |

१२) जिन commercial activities में सरकार की कंपनियां (PSUs) हैं, उन में से ज्यादातर PSUs में जरुरत से बहुत ज्यादा स्टाफ और अन्य resources हैं फिर भी उन के private sector के competitors से उनका नफा कम है, या वह नुकसान कर कहे हैं | उन सब को अपनी कार्यक्षमता और profitability बढ़ाने का मौका दिया जाय | और अगर वह ऐसा न कर पायें तो उन्हें Private कंपनियों को सोंपा जाय |

१३) देश के अलग अलग राज्यों में कुछ ऐसे विस्तार हैं, जहां किसी लोकल गुंडे, politician, ग्रुप या किसी कौम की सरकार चलती है | ऐसी हर parallel government को चुन-चुन कर उस के उपर भारत के सार्वभौमत्व को स्थापित करने का आवेदन |

१४) इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बडे बडे प्रोजेक्ट तो बन जाते हैं, लेकिन उन्हें आम आदमी कैसे use कर पाये ऐसा ध्यान में रखा जाय, तो बहुत अच्छा होगा | यहां मुंबइ के T2 जैसे टर्मिनल, या बडे हाइ-वे तो बन जाते हैं, लेकिन उनके अंतिम फिनिशिंग या योग्य signage जैसे छोटे काम बाकी छोड दिये जाते हैं, जिससे सामान्य जनों का समय-शक्ति व्यय होता है और उन्हें काफी असुविधाओंका सामना करना पडता है |

१५) आज ज्यादातर सरकारी स्कूलों या कोलेज में शिक्षा का स्तर एकदम निम्न कक्षा पर चला गया है | बच्चों को डीग्रीयां तो मिलतीं हैं पर उन्हें कुछ प्रेक्टिकल ट्रेनिंग न मिलने की वजह से वह किसी काम के पात्र नहीं होते | शिक्षा-व्यवस्था खराब होने की दूसरी एक वजह है, शिक्षकों की गुणवत्ता | पगार कम होने की वजह से अच्छे लोग शिक्षक बनना पसंद नहीं करते | अर्थहीन शिक्षा-व्यवस्था बेरोजगारी की मुख्य वजह है | शिक्षा को अर्थपूर्ण बनाने की बिनंती |

१६) भारत में बेरोजगारी का एक दूसरा बडा कारण है, Unions | इधर भी अलग-अलग राजनैतिक पार्टीयां कम से कम काम करके ज्यादा लाभ पाने के सपने दिखाकर employees की आदतों के साथ बिझनेस की कार्यक्षमता और profitability बिगाड रहीं हैं | Labour laws में उचित परिवर्तन की आवश्यकता है | नौकरी मिलना नहीं बल्की काम पाना हक होना चाहिए | जोब मार्केट में राजनैतिक पार्टीयां तथा युनियनों की दखल बन्द होंगी तो ही सब का भला होगा |

१७) Information Technology का सही उपयोग करें | आम जनता को रोज काम आनेवाली information किसी वेबसाइट या और किसी माध्यमों से समय पर मिले तो हर साल लाखों दिनों का समय बच जाएगा | इन्डीयन रेलवे की online बूकींग की साइट तत्काल के बूकींग के समय दो घंटों तक खुले ही नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए | इस के जैसे अनेक उपायों से आमजनता का अधिकांश समय बचेगा जो देश के आर्थिक विकास में उपयुक्त हो सकता है |

१८) मुंबइ जैसे शहरों में फुटपाथों पर चलने की जगह ही नहीं हैं | फूटपाथ पर फेरिवालों तथा व्यापारियों का कब्ज़ा है | फुटपाथ मुक्त हों तथा चलने योग्य बनें ऐसी अपेक्षा |

१९) मुंबइ को Shanghai जैसा बनाने के वायदे देकर काफी सरकारोंने अनेक प्रोजेक्ट पास करवाकर करोडों रुपयों का खान-पान किया है | मुंबइ के ज्यादातर रास्तों पर कहीं भी 100 मीटर का अच्छी गुणवत्ता का, बिना उबड-खाबड का रास्ता नहीं है | Shanghai जैसा बनाने के लिए अनेक लोगों ने Shanghai की यात्राएं कीं, बडे बजेट पास करवाये, और अंत में हमें खड्डे ही मिले हैं | ऐसी सपनों की सौदागरी बन्द होगी ऐसी उम्मीद |

२०) मुंबइ की लोकल ट्रेन तथा सीटी बस सर्विस अच्छी है लेकिन उसे आधुनिक और कार्यक्षम बनाने की जरुरत है | सफाइ, सुरक्षा पर ध्यान जरुरी है | ट्रेन-बस की डिझाईन या उस संबंधी अन्य कोइ निर्णय लेने वाले बडे लोग इन ट्रेन-बस में सफर करें और लोगों को क्या परेशानियां होतीं हैं उस का वास्तविक अनुभव करें ऐसा compulsory बनायें | मुंबइ जैसी पब्लिक ट्रान्सपोर्ट व्यवस्था सारे शहरों में स्थापित करें ऐसी अपेक्षा |

२१) न्याय व्यवस्था में भरपूर परिवर्तन जरुरी है | तारीख-पे-तारीख की वजह से Indian Judiciary पर से आम जनता भरोसा उठ गया है | “कानून है” यह सबूत न्याय व्यवस्था की ओर से पेश हो ऐसी व्यवस्था करेंगे तो बडी महेरबानी होगी |

२२) भारत में किसी भी सरकारी दफ्तर में जाएंगे तो अपना काम कितने समय में पूरा होगा इस की कोइ गेरंटी नहीं है | सरकारी कर्मचारीयों में उन के तथा आम जनता के समय की कीमत के विषय में जाग्रति आये और उन में कोइ भी काम पूर्वनिश्चित समय-अवधि में पूरा हो ही जाय ऐसी accountability स्थापित करेंगे तो करोडों मानव दिनों का समय बचेगा |

भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है, लेकिन भारत के politicians और कुछ multinational कंपनियां हीं इस का साक्षात्कार कर रहे हैं | उपर कथित बातों पर कुछ ठोस काम होगा, आम जनता की जिंदगी आसान होगी तो मेरे जैसे सामान्य नागरिकों को भी भारत सोने की चिड़िया ही महसूस होगी |

हार्दिक शुभेच्छाओं के साथ आभार…

– भारत का सामान्य नागरिक

लीडर को कितना काम करना चाहिए? नरेन्द्र मोदी से बिझनेस लीडरशीप के पाठ |

नरेन्द्र मोदी ने अपनी व्यक्तिगत ताकत के बलबुते पर अपने साम्राज्य का सर्जन किया है |

उनकी राजनैतिक कुनेह, उनका vision, उनकी संभाषण कला यह सब तो प्रशंसनीय हैं ही, लेकिन बिझनेस लीडर के point of view से उनका हार्ड वर्क, उनका कमीटमेन्ट और उनकी कार्यक्षमता तारिफ के काबिल है |

पिछले चार-पांच महिनों में उन्होंने कड़ी से कड़ी मेहनत की है | सेंकडों रैलियॉं, सभाएं, इन्टरव्यूझ तथा अन्य प्रचार प्रवृत्तिओं में हिस्सा लिया है | रोज चार घंटों से ज्यादा नींद नहीं पाई है | लाखों किलोमीटर्स का प्रवास किया है |

इस चुनाव में उनके जितनी मेहनत शायद बीजेपी के किसी नेता या कार्यकर ने भी नहीं की है |

बिझनेस लीडर भी अपनी कंपनी में सब से ज्यादा काम करनेवाला होना चाहिए | मैं अपने बिझनेस सेमिनारों में हमेशा कहता हुं कि अगर हमारे बिझनेस का कोइ एक कर्मचारी भी १२ घंटे काम करता है, तो हमारे खुद के ड्युटी अवर्स १२ से कम नहीं ही होने चाहिए | ड्युटी पर होना मतलब हम अपनी ओफिस में ही बैठे रहें यह जरुरी नहीं है | ओफिस या बाहर कहीं भी हो, लेकिन काम के सिलसिले में ही हम व्यस्त हों यह जरुरी है |

बहोत सारे बिझनेस गुरु अपने लेक्चर्स में कहते हैं कि “हमें हार्ड वर्क नहीं, स्मार्ट वर्क करना चाहिए | टेन्शन लेना नहीं, टेन्शन देना चाहिए |”

यह सब किताबी बकवास है |

सोचो नरेन्द्र मोदी ने खुद इतना काम नहीं किया होता केवल “स्मार्ट वर्क” पर, “टेन्शन देने” पर ध्यान केन्द्रित किया होता, तो उन्हें इतनी सफलता मिल पाती? रीमोट कन्ट्रोल से वारिस में मिली जागीर उडाई जा सकती है, नई जागीर खडी नहीं की जा सकती |

लीडर के कमीटमेन्ट से ज्यादा टीम के  कमीटमेन्ट की आशा रखना अर्थहीन है | अगर लीडर भागेगा, लीडर दिन-रात मेहनत करेगा तो ही टीम को काम करने का उत्साह, प्रेरणा और ताकत मिलेंगे |

नरेन्द्र मोदी ने यह कर के दिखाया है |
अपनी टीम को मोटीवेट करने के हेतु, बिझनेस लीडर के लिए कठोर परिश्रम का कोइ विकल्प नहीं है |

राजनाथ सिंघ जी से बिझनेस लीडरशीप का पाठ

नरेन्द्र मोदी ने अपने व्यक्तिगत charishma दिखाकर बीजेपी को कल ऐतिहासिक बहुमत दिलाया है |
मोदी जी को नापसंद करनेवाले ऐसा कह सकते हैं कि यह तो पूरी बीजेपी के प्रयत्नों का नतीजा है, या यह anti-congress  wave है जिसका फायदा बीजेपी को मिला है…

जो कुछ भी हो, लेकिन एक बात तय है कि अगर बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्रीपद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया होता, तो बीजेपी को इतनी भारी सफलता किसी हाल में हांसल नहीं होती | इस भारी मात्रा में बीजेपी की सफलता का पूरा श्रेय मात्र दो व्यक्तियों को जाता है | एक तो नरेन्द्र मोदी खुद और दूसरे बीजेपी के अघ्यक्ष राजनाथ सिंघ |

इस पूरी यशगाथा में राजनाथ सिंघ ने एक बुझु्र्ग, परिपक्व और दूरदर्शी नेता की भूमिका बखूब निभाई है |

जिस तरह उन्होंने नरेन्द्र मोदी की काबिलियत को पहचानकर, उन पर पूरा भरोसा रखकर, बहुत सारे दिग्गजों के खिलाफ जाकर भी नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदारी सौंपकर भारत को एक नरेन्द्र मोदी नाम की नइ आशा दिलाइ है, उस पूरे उदाहरण से हम अपने बिझनेस के लिए एक अच्छा पाठ सिख सकते है |

किसी भी विकासशील बिझनेस में दो प्रकार के employees होते है | एक ऐसे जो बहुत पुराने होते हैं, जो बिझनेसमेन के साथ शुरुआत से जुडे होते हैं | उनकी योग्यता वफादारी तथा बिझनेस जैसे है वैसे चलाये रखने की क्षमता तक सीमीत होती है | यह लोग बिझनेस को एक लेवल से आगे ले जाने के लिए असमर्थ होते हैं, फिर भी उन्हें ऐसा लगता है कि वो ही बिझनेस के सूत्रघार हैं और वह खुद नहीं होंगे तो बिझनेस बिखर जाएगा | वास्तव में यह लोग ही बिझनेस की विकासयात्रा में एक बाधा होते हैं | वह खुद तो कुछ ज्यादा कर नहीं सकते और किसी नये व्यक्ति को आ कर कुछ परिवर्तन लाने की अनुमती भी नहीं दे सकते |

दूसरे कुछ ऐसे काबिल नये employees होते हैं जिन में बिझनेस को आगे ले जाने की भरपूर काबिलियत रहती है | उन में बिझनेस की नइ चुनौतियों का सामना करके उसे विकास की नइ ऊंचाईयों तक पहुंचाने की क्षमता होती है |

बीजेपी में भी ऐसे पुराने लोग हैं जिन की क्षमता पार्टी को एक लेवल से ज्यादा ले जाने की बिलकुल नहीं है | अगर ऐसे ऐतिहासिक दिग्गजों को बागडोर सौंपते तो बीजेपी को इतनी सफलता कभी नहीं मिल पाती |

राजनाथ सिंघ को सही व्यक्ति की, उस की काबिलियत की पहचान है, और ऐसी व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपकर, पुराने दिग्गजों को समझा-पटाकर, उन्हें अपने स्थान पर रखकर नये सेनापति को पूरी स्वतंत्रता देकर, उस के पीछे चट्टान की तरह खडा रहकर, उस का हौंसला बढ़ाकर उन्होंने भारत के इतिहास को एक नया मोड दिया है |

बिझनेसमेन को भी अपनी कंपनी में स्थापित स्पीड-ब्रेकर्स को अपनी जगह पर रखकर, नये काबिल ड्राइवर को चुनकर उसे कंपनी की यात्रा आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता देनी चाहिए | स्पीड-ब्रेकर नडेंगे, रुठेंगे, नखरे करेंगे | लेकिन चिंता मत करो, क्यों कि यह स्पीड-ब्रेकर कहीं जा नहीं सकते | आज के समय में कोइ दूसरी कंपनी इस पुराने स्पीड-ब्रेकर को नहीं रखेगी | सही ड्राइवर ही आप को आगे जाने में मदद कर सकता है | उसे पेट्रोल दो, उस पर ब्रेक मत मारो |

सही ड्राइवर अपनी काबिलियत से किसी भी पार्टी, देश या कंपनी को नइ राह, नइ आश दिखा सकता है | राजनाथ सिंघ के “नरेन्द्रभाइ” ने यह साबित कर दिया है | हमें अपने बिझनेस के लिए उन से लीडरशीप का यही पाठ सिखने जैसा है |

हमारे मार्केटींग में क्या गलत हो सकता है?

कभी कभी हम गलत कस्टमर को अपना माल बेचने की कोशिश करते हैं | हमारा कस्टमर कौन है, यह नहीं समज पाना यही हमारी सब से बड़ी मार्केटींग गलती हो सकती है |

हर एक प्रोडक्ट या सर्विस का एक कस्टमर होता है | उस कस्टमर को उस प्रोडक्ट में कुछ value, कुछ मूल्य दिखता है, जो प्रोडक्ट की कीमत के सिवाय कुछ और, कुछ दूसरा होता है |

२ लाख की Tata Nano का भी एक ग्राहक वर्ग होता है | और ४०-५० लाख की मर्सिडीज़ का भी कस्टमर ग्रुप होता है, और यह दोनों अलग लोग होते हैं, दोनों की पसंद, उनकी Lifestyle, उनकी सोच, तरिके सब कुछ अलग होता है |

उन दोनों कस्टमरों को अपनी अपनी Nano या Mercedez में कुछ value, कुछ मूल्य दिखता है, जो कार की कीमत के सिवाय कुछ और, कुछ दूसरा होता है |

मार्केटींग में हमारी कोशिश सही कस्टमरों को पहचानके, उनकी ज़रुरतों को समजके उन्हें हमारी प्रोडक्ट-सर्विस के बारे में बता के बेचना यहीं होनी चाहिए | गलत कस्टमर को अपनी प्रोडक्ट के बारे में चाहे कितना भी बताओ, उस के फायदे दिखलाओ, वह हमारी प्रोडक्ट नहीं खरीदेगा क्यों कि उसे हमारी प्रोडक्ट में कुछ Value नहीं दिखती | उन के पीछे मेहनत-समय-पैसा बरबाद मत करो |

सिस्टम और प्रोसेस में तालमेल से ही कार्यक्षमता बढ़ सकती है |

हमारी सरकारी ओफिसों में करोडों रुपये खर्च कर के Information Technology की आधुनिक सिस्टम्स लगाइं जातीं हैं लेकिन फिर भी गलत प्रोसेसींग-गलत कार्यपद्धति की वजह से आम जनता के समय की कोइ बचत या तकलिफों में कमी होती नहीं है, उसका जीवंत उदाहरण है पासपोर्ट सेवा केन्द्र |

पासपोर्ट एप्लीकेशन के प्रोसेसींग का काम प्राइवेट कंपनी Tata Consultancy Services-TCS को दिया को दिया गया है |
अलबत्त TCS की सिस्टम की वजह से काउन्टर पर पहुंचने के बाद काम त्वरा से होता है, पासपोर्ट सेवा केन्द्र में TCS के कर्मचारियों का काम, बर्ताव, ट्रेनिंग प्रशंसनिय है | उसी पासपोर्ट केेन्द्र में अभी भी बाकी के कुछ कामों के लिए सरकारी कर्मचारी ही हैं, और TCS के काम करने के तरिके का रंग उनके उपर कथ्थई नहीं चढ़ा है | भारत में सरकारी कर्मचारियों के पास से TCS जैसे काम की उम्मीद भी नहीं रख सकते |

TCS की  वजह से काम सिस्टेमेटीक जरुर हुआ है, पर पूरी प्रक्रिया-प्रोसेसींग में कहीं तो बहोत बडा fault है | इसी वजह से पासपोर्ट केन्द्रों में जनसमुदाय के समय का अधिक व्यय होता है |

मुंबइ-मलाड स्थित पासपोर्ट सेवा केन्द्र में मैंने स्व-अनुभव किया है कि पासपोर्ट प्रक्रिया के लिए बनाये गये चार काउन्टरों पर टोटल १५-२० मिनिट का ही समय ही लगता है | पासपोर्ट सेवा केन्द्र में जाने के लिए पहले से appointment दी जाती है | लेकिन फिर भी एक व्यक्ति को चार काउन्टर पर काम पूरा करने में कम से कम 3 घंटों का समय केन्द्र में लगता ही है | क्यों कि सब को अलग-अलग ७ जगहों पर अपना नंबर आने का इन्तज़ार करना पडता है |

इस कारण हर व्यक्ति के करिब २.५ घंटे व्यय होते है | एक दिन में ३०० लोग एक केन्द्र में आते हैं | हर दिन ऐसा एक केन्द्र करिब १०० working days के व्यय का कारण बनता है |


क्यों कि पासपोर्ट संबंधी प्रक्रिया के बारे में सही तरिके से स्टडी नहीं हुआ है |

एक तो appointment के लिए समय देने का तरिका गलत है | १५ मिनिट के स्लोट में एक साथ १५-२० लोगों को एक समय पर बुलाया जाता है | हर अर्जदार को कुल मिला के अलग इलग चार काउन्टरों पर जाना पडता है |

इस का मतलब है कि केन्द्र की चारों प्रोसेस के काउन्टर्स १५ मिनिट में १५-२० लोगों को हेन्डल कर लेने चाहिए | पर सब से पहले काउन्टर पर ही ऐसा नहीं होता है | चार काउन्टर में से सब से पहले काउन्टर पर सब से ज्यादा समय लगता है | और चार में से यह पहले काउन्टरों पर ही मेनपावर सब से कम है | अंदर के २-३-४ (A-B-C) काउन्टरों पर अनेक गुना मेनपावर है | परंतु यहां तक पहुंचने के लिए screening करनेवाले पहले काउन्टर पर सब से ज्यादा समय लगता है, और उन पर ही मेनपावर कम है | यह बोटल-नेक का typical example है |

कार्यक्षमता (Efficiency) बढ़ाने के लिए सिस्टम और प्रोसेस-कार्यपद्धति का तालमेल सही होना चाहिए | TCS या इस प्रोसेस की Design  में शामिल एजन्सी अगर प्रोसेस के अमलीकरण में प्रेक्टीकल Bottleneck का अभ्यास कर के उन  में सुधार जब तक नहीं करेगी तब तक बडी बडी सिस्टम्स लगाने के बाद भी २० मिनिट के काम के लिए ३ घंटे पब्लिक को बिताने ही पडेंगे |

“Ullu Banaving” – Manipulative Pricing gets punished

Some organizations are notorious for misleading pricing claims. Publisher of India’s leading English daily The Times Of India frequently comes out with misleading pricing claims. I received a call from Times group’s magazine distribution company saying “On one year subscription, we offer 50% discount. The newsstand price is 1440. But we charge only 840.” I asked “But then it is not 50% discount. 50% of 1440 is 720.” “Yes sir. We add Rs.120 as delivery charge. Rs 10 per issue.” They may be right in claiming that delivery charge, but to the customer whatever she pays is the final price. So, 840 instead of 1440 is 41.67%. It is not 50%.

Then why should they claim it and try to mislead the customer? It is bad customer experience.

No wonder Times’ magazine portfolio sucks. Customer does not forgive Ullu Banaving manipulative pricing.

हमारा मार्केटींग विश्व कितना बड़ा है?

अरनब गोस्वामी अपनी इंग्लीश न्यूझ चैनल Times Now पर दिखाये जाने वाले इन्टरव्यू या पेनल डीस्कशन में उपस्थित महानुभावों से चिल्ला-चिल्लाकर पूछता है “The whole India wants to know…पूरा देश जानना चाहता है. आपने ऐसा क्यों किया?”

जब की देश के ९५ प्रतिशत लोग कोई इंग्लीश न्यूझ चैनल देखते ही नहीं हैं, उनको भनक मात्र नहीं है कि अरनब किस “पूरे देश” की बात कर रहा है ?

दबंग फिल्म में एक घटिया किस्म के घटिया आइटम सोंग “फेविकोल से” (मेरे मत अनुसार इससे ज्यादा गंदा आइटम सोंग अभी तक आया नहीं है |) में घटिया एक्ट्रेस को सलमान खान कहता है “पूरे इन्डीया को तुने गुलाम किया है |” भारत के ६० करोड से ज्यादा मर्दों में से कितने लोगों का टेस्ट सैफ अली खान से बेहतर होगा जिन्हें ऐसे बेहुदा कपडोंवाली हीरोइन की गुलामी पसंद नहीं होगी? फिर किस पूरे इन्डीया की गुलामी की बात कर रहा है सलमान खान?

२-३ प्रतिशत इंग्लीश स्पीकींग लोगों को “पूरा इन्डीया” बताने वाला अरनब या करिना की गंदी हरकतों पर फीदा हो कर अपने साथ पूरे देश को गुलाम घोषित करने वाला सलमान दोनों अपने छोटे मार्केटींग विश्व की साइझ के अलावा और कुछ नहीं प्रदर्शित करते है |

मार्केटींग में ऐसी बडी बडी बातें बोलने का रिवाज़ है | अपने टार्गेट कस्टमर बेझ को ही पूरी मार्केट मान कर कंपनियां अपने दावे करतीं है | इस लिए ऐसे पूरे इन्डीया के दावों को मार्केटींग की भाषा में समझना जरुरी है |

हमारा कस्टमर बेझ जितना बड़ा, उतना हमारा मार्केटींग का विश्व बड़ा… अपने मार्केटींग के विश्व को असली भौगोलिक विश्व की सीमाओं तक फैलाने का ध्येय हर दूरदर्शी बिझनेसमेन का होना चाहिए…|

हमारे मार्केटींग विश्व की साइझ बढ़ाएं, ताकि हमारा “पूरा इन्डीया” सही अर्थ में पूरा ही हो़…