Eskimo को Refrigerator बेचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए

सेल्समेन को चुनते वक्त अगर हम ऐसे लोग ढूंढते हैं, जो किसी भी कस्टमर को कुछ भी कर के – येनकेनप्रकारेण हमारा माल चिपका देने की काबिलियत रखते हों, तो हमारी गलती होगी |

कभी कभी हम कोई चीज़ खरिदने के लिए जाते हैं, तब वह सेल्समेन हमें वह चीज़ पसंद न हो फिर भी चिपका दे, तो हमें बाद में कैसा महसूस होता है?

उस सेल्समेन ने हमें उल्लु बनाया, हमें cheat किया, उस कंपनी से अब हम shopping करना कम पसंद करेंगे, ऐसा हमें लगता है, ना? और उपर से हम दस लोगों को भी बतायेंगे की इस कंपनी या शो-रुम का माल नहीं लेना चाहिए |

कुछ साल पहले हमें जरुरत न हो तो भी Encyclopedia या आज कल किसी Multi-Level Marketing कंपनी की कुछ काम न आनेवाली घटिया, useless product चिपकानेवाले किसी दोस्त या रिश्तेदार को हम किस तरह से देखते हैं?

हमारा “बोल-बच्चन” सेल्समेन जब किसी को माल चिपकाता है, तो हम खुश होते हैं, लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए की १०० रुपये का माल चिपकाकर उसने हमारे हज़ारों रुपयों के भविष्य के कस्टमर को भगा दिया है | ऐसा शोर्टकट आगे चलकर कंपनी को भारी पड़ता है, बहुत नुकसान कराता है |

तो क्या करना चाहिए?

सेल्समेन और हमारे मार्केटिंग के प्रयासों का Focus सही कस्टमर तक पहुंचकर उसे और उस के जरिए दूसरों को एक नहीं अनेकबार माल बेचने की कोशिशों पर होना चाहिए…|

Eskimo को जिस चीज़ की जरुरत हो वह ही उसे बेचें तो वह खुश होगा, और दूसरे Eskimos को भी बतायेगा |

भारत में न्याय व्यवस्था क्यों अर्थहीन हो गई है ?

१९७३ में दिल्ही की सीटी बस DTC का एक कन्डक्टर एक महिला पेसेन्जर को १५ के बदले १० पैसों की टिकिट देता है | चेकींग स्कवोड इसे पकडती है | डीपार्टमेन्ट इन्कवायरी शुरु होती है |

१९७६ में इन्कवायरी का रीपोर्ट आया, उसे नौकरी से निकाला गया | उसने लेबर कोर्ट में अपील की |

१९९० में लेबर कोर्ट का फैसला आता है | उस कन्डक्टर को वापस काम पर लेने का आदेश DTC को दिया जाता है | DTC हाइकोर्ट में अपील करती है |

२००८ में हाइकोर्ट DTC की अपील नकारती है | DTC फिर से Review Petition दाखिल करती है |

और अब मामला शुरु होने के ४१ सालों के बाद २०१४ में उसकी सुनवाई हो रही है |

नोंधनीय बात मात्र यही नहीं है कि ५ पैसों के मामले का केस ४१ सालों से चल रहा है, किंतु यह साबित करता है की भारत की न्याय व्यवस्था कितनी हास्यास्पद और अर्थहीन है |

ऐसी न्याय व्यवस्था के कारण ही देश में मुझरिम गुनाह करने के बाद भी बिना रोक-टोक घुमते रहते हैं | जिसे कानून की अर्थहीनता का पता चल गया है, वह बेफिक्र हो कर इसका फायदा उठाते हैं | गुनाह करनेवाले किसी को कानून का डर नहीं है, उलटा न्याय पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले को कानून की इस शिथिलता का डर है, क्यों कि यहां तो बस न्याय के नाम पर “तारिख पर तारिख” के सिलसिले के साथ साथ अनेक दसकों तक केस चलता ही रहता है |

देश को गुनहगार और ठगों से मुक्त करना हो, तो अंग्रेझों के समय से चली आ रही इस हास्यास्पद न्यायव्यवस्था में भारी सुधार आवश्यक हैं |

This is how HDFC is harassing its customers through their Relationship Managers

Relationship Managers are ideally employed to improve customer relationships. But badly designed customer relationship initiatives and poor follow-up by their superiors result into these ornamental positions causing more annoyance and harassment to the customers than helping them. HDFC Bank has such RMs, who reduce value instead of adding to the customer’s experience. The only focus these RMs appear to have is to convince the Preferred Customers for buying some or the other product of HDFC Bank. This is more of customer exploitation than relationship building. Here is how they reduce value :
1) They unpleasantly surprise the customer
Modus operandi : First send the charged Credit/Debit card to the customer and then force the customer to ask why it came?

a) On 12 July 2014, I received an SMS which says that “Please keep information regarding your credit card no. ending with 2878 confidential.”
This surprised me because I did not have any card ending with that number.
b) Next day, on 13 July 2014, I received another SMS saying “Your credit card ending with 2878 is being sent you by xyz courier.”
c) I called the helpline number to find out what is this about and I was told “Your RM has requested an upgrade of the card.”
d) I complained with that Customer Care executive and I was told they will look into the matter. No update is received from HDFC Bank about this complaint till 20.07.2014.
e) I contacted the RM (Mr Rudolph) at HDFC, Malad-East and asked him about why I am being sent the new card. He said “It is automatically upgraded by the system for selected Preferred Customers.” He meant that only special customers are given this privilege. He did not mention anything about the charges.

2) They keep the customer in the dark
a) When the new card came by courier on 16.07.2014, no intimation was given about the status of the existing (old) card and how long it will remain valid. I had to ask the helpline number to find that it will be valid for two months from the date it is sent to you.

b) My current card is branded as “Signature” card. I could not find the details of that card on the www.hdfcbank.com , so I asked the customer care person who took 10 minutes to find out the annual charges amount (may be it is phased out). What is the point of giving a customer a card valid till 2016, if you are not able to provide basis information about the card through your web site or customer care as soon as new types of cards are introduced?

3) They hide the Credit/Debit Card charges from the customers
a) On checking the new Credit card charges, I found that it has an annual fee of Rs.2499 (unless I spend 3.5L in a year through that card). This is not communicated to me before sending the card by anybody.
On asking the helpline on 20.07.2014 (Ms Kavita, Conversation reference number : 14201872674) she told me :

“You have given the consent to the RM and we have confirmed the same by sending you the SMS on 22.06.2014 which reads ‘Dear Customer, Limit Increase & Upgrade on your HDFC Bank Credit Card will be done basis your consent given to RM. Sms NOLEUPG to 5676712 if you are not interested.’”

b) Same has happened with my Debit Card on my HUF account. That card also came without my consent or request and now I found that they have charged Rs.224.72 during 2013-14 as charges on the Debit Card which I have not used at all, neither did I ask for it.

4) They manipulate the customer

a) The above mentioned SMS is assuming consent if the customer does not respond. Whereas the default answer should be taken as No, if it seen from a customer-friendly view point.
b) It does not say anything about the additional charges the upgrade will entail. But still, it is being used as a proof of consent.
c) How can a customer know that the “Upgrade” is going to cost him more?
This is nothing short of manipulation and unfair trade practices.
5) They unnecessarily harass the customer
a) The card upgrade was not initiated by me. I have not consented for the upgrade. They have gone ahead and sought a self-confirmation. I had to ask the customer care twice to find out what is this all about. The second conversation took 35 minutes…!
b) On asking how can I cancel this card, I was told by Ms Kavita “You write a cover letter, cut the card and drop it in the box.”
Why should a customer go through all this, for something that he has not initiated at all?
Why this all harassment?

6) The Relationship Managers are only interested in asking new accounts from customers
When I met Mr Rudolph on 14.07.2014 at branch office, to convey my grievances, he was more interested in getting new accounts from me. He assured me about HUF Debit Card charges reversal, but no update from anybody since then.

Is this how they are supposed to manage and improve customer relationships?

 

पानी की हो या दु:खों की, बारिश रुकती ही है |

मुंबइ में जब ज़ोरों की बारिश होती है, घंटों तक और कभी कभी कुछ दिनों तक जमकर बारिश होती है, तब ऐसा लगता है, कि यह बारिश रुकेगी ही नहीं |

लेकिन आखिर बारिश रुकती ही है | सूरज की रोशनी वापस आती ही है | दिन प्रकाश सभर हो जाता है | जीवन की चहल पहल फिर से शुरु हो जाती है | हम बारिश और उस से होनेवाली तकलिफें भूल जाते हैं |

जीवन में भी ऐसा ही होता है | जब दु:खों की, तकलिफों की बारिश होती है, जब समस्याएं हमें घेर लेतीं हैं, तब हमें लगता है, की अब इस का कोइ अंत नहीं होगा |

लेकिन उस वक्त यही याद रखना जरुरी है, की कोइ भी बारिश आखिर में रुकती ही है | चाहे वो पानी की हो या दु:खों की |

जीवन के आकाश में संभावनाओं का मेघधनुष्य हमारे जीवन को विभिन्न रंगों से भरने के लिए हमेशा मौजुद ही है |

हां मौसम बदलने में समय लगता है |
थोडा धैर्य रखें तो हर मौसम बदलता ही है |
चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो…!

Career में महिला और पुरुष समान क्यों नहीं हैं ?

Career में आगे बढना पुरुषों के मुकाबले  महिलाओंके लिए ज्यादा कठिन है | व्यवसाय-नौकरी करनेवाली career महिलाओं का जीवन आसान नहीं है |

PepsiCo कंपनी के सर्वोच्च स्थान पर बिराजमान भारतीय NRI महिला इन्द्रा नूयी ने अपनी ज़िंदगी का एक उदाहरण दे कर इस बात को पेश करने की कोशिश की है की अपनी Career में आगे बढने के लिए महिलाओंको ओफिस में तो पुरुषों के जितनी महेनत करनी ही पडती है, लेकिन साथ साथ उन्हें घर-परिवार की जिम्मेदारियां भी निभानी पडतीं हैं, जो पुरुषों को नहीं करना पडता | दोनों क्षेत्रों को न्याय देने में कहीं न कहीं तो कमी रह ही जाती है | इस वजह से महिलाओं को हमेशा अपने आप के साथ कुछ न कुछ समझौता-समाधान करना ही पडता है |

इन्द्रा नूयी के साथ उनकी माता, उनके पति राज नूयी तथा उनकी दो बेटियां उनके अमरिका के घर में रहतीं हैं | हर रोज रात १२ बजे ओफिस से घर पहुंचनेवाली इन्द्रा नूयी को जिस दिन PepsiCo की President चुना गया उस दिन वह दो घंटे जल्दी रात १० बजे घर पहुंची | अपनी मां को यह खुशखबर वह खुद देना चाहतीं थीं |

घर पहुंचते ही इन्द्राजी ने अपनी मां से कहा “मां, आज मैं आप के लिए एक बडी खुशखबर लाई हुं |”

मां : “तुम्हारी खुशखबर बाद में | पहले तुम दुकान पर जा कर दूध ले आओ |”

इन्द्रा : “मैं ने गैरेज में राज की गाडी देखी | वह कब आये है? आप उन्हें भी तो दूध लाने के लिए कह सकतीं थीं |”

मां : “राज ८ बजे आये हैं, लेकिन वह थक गये हैं | कल सुबह के लिए घर में दूध नहीं है, इस लिए तुम ही जा कर पहले दूध ले आओ |”

आखिर इन्द्रा पास वाले स्टोर पर जा कर दूध ले कर आईं और अपनी मां को मजाक में कहा “क्या मां, आप की बेटी को दुनिया की इतनी बडी कंपनी का President चुना गया है, और आप उस को दूध लेने को भेजतीं हैं?”

तब उनकी मां ने इन्द्रा नूयी को जो कहा वह अपनी Career में व्यस्त हर महिला की कठिन वास्तविकता का प्रतिघोष है | इन्द्रा नूयी की मां ने कहा, “हां, माना की तुम बडी कंपनी की प्रेसिडेन्ट हो, लेकिन उस के साथ साथ तुम एक मां, एक पत्नी, एक पुत्री और एक बहु भी हो | तुम्हारी कंपनी की प्रेसिडेन्ट की भूमिका तो और कोई भी निभा सकता है, परंतु तुम्हारी घर की यह भूमिकाएं और कोई नहीं निभा सकता | इस लिए हर रोज जब घर पहुंचो तब PepsiCo कंपनी की प्रेसिडेन्ट का ताज गैरेज में ही छोड कर आना, और अपने घर की जिम्मेदारियों की भूमिकाएं निभाना |”

दुनियाभर में करोडों इन्द्राएं इसी तरह अपनी Career और अपने घर-परिवार की जिन्मेदारियों को संतुलित करने के लिए झुझतीं रहतीं हैं |

खाना पकाना, कपडे-बरतन-साफ सफाई, घर का सामान खरिदना, बच्चे पैदा करना, उनका पालन-पोषण, उनकी  पढ़ाई, सांस-ससुर की देखभाल, ससुराल और परिवार के अन्य सभ्यों के साथ तालमेल बनाये रखना यह सारी जिम्मेदारियों का महत्तम बोज घर की महिला के सिर पर ही होता है | अपने नौकरी-व्यवसाय में व्यस्त महिलाओं के लिए भी इस में से राहत नहीं है, फिर चाहे वह PepsiCo की प्रेसिडेन्ट इन्द्रा नूयी भी क्यों न हो?

हम नारी शक्ति को सन्मान देने की बातें करते हैं | भ्रूण-हत्या रोकने की, बेटियां बचाने की मोहीम चलाते हैं | यह बहोत अच्छी बातें हैं | लेकिन अगर इस के साथ साथ हमारे घर, परिवार, समाज में जो ऐसी महिलाएं हैं जो अपना Career और घर-परिवार की दुगनी जिम्मेदारियां निभा रहीं हैं, उन्हें समझने की कोशिश करेंगे, उनके प्रयत्नों की कदर करेंगे, हो सके तो उनकी सहायता कर के कुछ जिम्मेदारियां कम करेंगे, और कुछ न हो सके तो कम से कम उनकी जिम्मेदारियों का बोज नहीं बढाएंगे, तो वह नारी शक्ति के सन्मान से कम नहीं होगा |

क्यों कि Career के मामले में पुरुषों का पलडा भारी है | उन्हें Career में सफल होने के लिए महिलाओं की तुलना में कम बोज उठाने पडते हैं | स्त्री-पुरुष की असमानता का संबंध इस बोज से भी है | अगर हमें समानता लानी हो, तो यह बोज समान करना होगा |