Monthly Archives: November 2015

How can Patanjali be even more successful?

Blessed by Baba Ramdev, Patanjali is really a great Indian brand. I admire the brand for its quality, honesty and the spirit of Indian nationalism behind it.

Patanjali’s products are excellent, even superior to its competitors. But, having excellent products alone does not promise success in consumer markets.

Proper marketing and branding has to match. With great products which compare with or surpass their MNC competition perfectly, Patanjali needs to work on its customer experience side as well.
Even though I am its customer and want to remain loyal to the brand, there are some problems which disturb me. Here are some weak customer experience aspects the brand must improve upon.

1) Good products must be made available consistently. Out-of-stock products give a window to competition to win our customers. When we go to a Patanjali outlet, we are not sure whether we will surely get a particular product or not, because one or the other product is out-of-stock regularly. Patanjali needs to stengthen its supply and distribution chain.

2) The stores are cramped. They look like a shop-cum-godown. A customer has to struggle her way through assorted items, cartons, boxes etc. spread across the store. The stores must be designed for a pleasant shopping experience. A revamp is a must.

3) The stores are under-staffed. The customers have to wait for a long time for their turn to be attended. Whatever staff is present, it is indifferent at best. They are like MTNL employees in the midst of the efficient telecom industry. They need to be customer friendly.

4) The stores have very restrictive timings. Also, they don’t give any carry bags (plastic, paper, cloth – nothing). Again, customer-centric approach is required.

Overall, the customer feels less than happy shopping at a Patanjali outlet.

This is typical of many Indian enterprises, which make great products but fail miserably in marketing, branding and customer experience management. This gives room to MNCs to succeed in the market with aggressive marketing even though they have inferior products.

I wish that brand Patanjali succeeds by being relevant to the largest customer base. In its today’s avatar, it is just another incarnation of a Khadi Bhandar. If it wants to compete successfully with the HULs, P&Gs, Nestles or Britannias it will have to shape itself up appropriately.

My swadeshi feelings may help me tolerate or ignore bad experience. But I doubt today’s younger generation will have patience to do that.
Either Patanjali should tighten its retailing to be more relevant or it should get out of retailing and get distributors who can sell it aggressively and appropriately in the manner the customer expects.

It is time Khadi Bhandar grows up. Or risk becoming overshadowed by swanky, modern malls.

मार्केट में मंदी क्यों और किसे लग रही है?

मंदी की असर सब को नहीं है, कुछ इन्डस्ट्रीझ अच्छा ग्रोथ कर रहीं हैं, और कुछ और मंदी का अनुभव कर रहीं हैं | मंदी के दो मुख्य कारण हैं…

१. ब्लेक मनी इकोनोमी पर ब्रेक
भारत की इकोनोमी का बडा हिस्सा दो नंबर की cash economy पर चलता है | इकोनोमी में ब्लेक मनी की एन्ट्री के दो बडे निम्न लिखित स्त्रोत हैं |

एक तो अलग अलग टाइप की ऱिश्वतों, घुस, bribe के रास्ते से unaccounted पैसा economy में घुसता है | इस में भी सब से बडा स्त्रोत था defence, रक्षा विभाग के कोन्ट्रेक्ट्स | पीछले एक साल से इस पर बहोत बडी ब्रेक लगी है | 
ब्लेक मनी का दूसरा बडा स्त्रोत है रीयल एस्टेट मार्केट | 
रीयल एस्टेट की खरीदी के समय unaccounted gold या दूसरा ऐसा ही पैसा इकोनोमी में फिर से प्रवेश करता है | इस इन्डस्ट्री में over supply और बेफाम दाम-वृद्धि की वजह से वास्तविक मंदी है | रीयल एस्टेट के सौदों की संख्या कम हो गइ है, जीस का बडा असर दो नंबरी इकोनोमी पर हुआ है | यह एक बडी वजह है, मंदी के माहोल की |
मार्केट में पैसा कम लग रहा है इस की वजह यही है | Liquidity कम होने के कारण मंदी स्वाभाविक है, और १००% official काम करनेवालोंको भी उस का असर होता ही है | 
२. E-commerce तथा m-commerce का प्रभाव
मोडर्न रीटेल (मॉल, सुपर मार्केट, चेन स्टोर्स इत्यादि) के साथ साथ e-commerce का प्रभाव बढ़ रहा है | इस का भारी असर छोटे व्यापारियों को हो रहा है | आज से ५-७ साल पहले यह e-commerce कंपनियों का प्रभाव शून्यवत था, लेकिन अब इनका पावर बढ़ा है | दिवाली-२०१५ में Amazon, Flipkart, Snapdeal etc. लगभग १२-१५ हजार करोड रुपयों का टर्नओवर किया | याद रहे, यह सारा टर्नओवर ट्रेडीशनल रीटेलर्स की जेब में से ही कम हुआ है | जो मेन्युफेक्चरर, होलसेलर, रिटेलर इस e-commerce प्लेटफोर्म का हिस्सा हैं, उन को मंदी का अनुभव नहीं हो रहा है | बाकी लोगों को उस का प्रभाव महसूस हो रहा है | e-commerce के साथ mobile app based m-commerce भी अनेक नई सुविधाएँ लेकर आ रहा है | यह सारी कंपनियों को अलग अलग foreign कंपनियों से धूम पैसा इन्वेस्टमेण्ट के रुप में मिला है, इस लिए वह नुक़सान झेल कर भी ग्राहकों को लुभाकर ज़्यादा डीस्काउन्ट दे रहीं हैं | यह सारा नाटक कितना लंबा चलेगा यह तो नहीं कह सकते क्यों कि यह उन की नुक़सान सहकर धंधा चलाने की क्षमता पर निर्भर है | जब तक easy money मिलेगी तब तक तो यह नाटक चलता रहेगा |

E-commerce अपने आप में बहोत फूलेगा-फलेगा | लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन में से बहोत सारी कंपनियाँ बंद हो जाएँगी या उन्हें कोइ दूसरी कंपनी ख़रीदकर ख़ुद में विलीन कर देगी | अंत में e-commerce के हर क्षेत्र में एक-दो नाम ही बचेंगे । ऐसा हो, यह bubble फूटे तब तक थोड़ा शोर होगा ।

इस का यह सबक हैं |

e-commerce/m-commerce revolution का हिस्सा बनकर उस की तेजी का लाभ उठायें | ऐसा न हो सके तो कस्टमर को वही सुविधा, चोइस, संतोष और value addition देने का प्रबंध करें जो e-commerce दे रहा है |