लीडर को कितना काम करना चाहिए? नरेन्द्र मोदी से बिझनेस लीडरशीप के पाठ |

नरेन्द्र मोदी ने अपनी व्यक्तिगत ताकत के बलबुते पर अपने साम्राज्य का सर्जन किया है |

उनकी राजनैतिक कुनेह, उनका vision, उनकी संभाषण कला यह सब तो प्रशंसनीय हैं ही, लेकिन बिझनेस लीडर के point of view से उनका हार्ड वर्क, उनका कमीटमेन्ट और उनकी कार्यक्षमता तारिफ के काबिल है |

पिछले चार-पांच महिनों में उन्होंने कड़ी से कड़ी मेहनत की है | सेंकडों रैलियॉं, सभाएं, इन्टरव्यूझ तथा अन्य प्रचार प्रवृत्तिओं में हिस्सा लिया है | रोज चार घंटों से ज्यादा नींद नहीं पाई है | लाखों किलोमीटर्स का प्रवास किया है |

इस चुनाव में उनके जितनी मेहनत शायद बीजेपी के किसी नेता या कार्यकर ने भी नहीं की है |

बिझनेस लीडर भी अपनी कंपनी में सब से ज्यादा काम करनेवाला होना चाहिए | मैं अपने बिझनेस सेमिनारों में हमेशा कहता हुं कि अगर हमारे बिझनेस का कोइ एक कर्मचारी भी १२ घंटे काम करता है, तो हमारे खुद के ड्युटी अवर्स १२ से कम नहीं ही होने चाहिए | ड्युटी पर होना मतलब हम अपनी ओफिस में ही बैठे रहें यह जरुरी नहीं है | ओफिस या बाहर कहीं भी हो, लेकिन काम के सिलसिले में ही हम व्यस्त हों यह जरुरी है |

बहोत सारे बिझनेस गुरु अपने लेक्चर्स में कहते हैं कि “हमें हार्ड वर्क नहीं, स्मार्ट वर्क करना चाहिए | टेन्शन लेना नहीं, टेन्शन देना चाहिए |”

यह सब किताबी बकवास है |

सोचो नरेन्द्र मोदी ने खुद इतना काम नहीं किया होता केवल “स्मार्ट वर्क” पर, “टेन्शन देने” पर ध्यान केन्द्रित किया होता, तो उन्हें इतनी सफलता मिल पाती? रीमोट कन्ट्रोल से वारिस में मिली जागीर उडाई जा सकती है, नई जागीर खडी नहीं की जा सकती |

लीडर के कमीटमेन्ट से ज्यादा टीम के  कमीटमेन्ट की आशा रखना अर्थहीन है | अगर लीडर भागेगा, लीडर दिन-रात मेहनत करेगा तो ही टीम को काम करने का उत्साह, प्रेरणा और ताकत मिलेंगे |

नरेन्द्र मोदी ने यह कर के दिखाया है |
अपनी टीम को मोटीवेट करने के हेतु, बिझनेस लीडर के लिए कठोर परिश्रम का कोइ विकल्प नहीं है |

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