एक सामान्य भारतीय का श्री नरेन्द्र मोदी को खुला निवेदन पत्र

आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी साहब,

सादर प्रणाम |

भारत देश का एक सामान्य नागरिक भी अपनी महेनत, मनोबल और महत्त्वाकांक्षा के बल पर सर्वोत्तम स्थान पर पहुंच सकता है, इस बात का ज्वलंत प्रमाण पेश कर ने के लिए आप को हार्दिक अभिनंदन तथा इस देश में सुराज्य लाने के आप के संकल्प और प्रयासों की सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं |

आप को यह पत्र लिखने की प्रेरणा मुझे मिली है उस आशा से जो आप के आगमन ने मेरे जैसे करोडों सामान्य भारतवासियों के मन में जगाई है | राजनीति और politicians पर से हम भारतवासियों का भरोसा उठ गया था, जो आपने पुन:स्थापित किया है |

भारत की विकासयात्रा को सही पटरी पर लाने के लिए अाप को बहुत सारे और बहुत बड़े काम करने हैं | और आप सारी कोशिशें करेंगे ऐसा हमें विश्वास है | लेकिन इन बड़े कामों की योजना बनाते वक्त आप हमारे जैसे करोड़ों छोटे लोगों के जीवन की समस्याओं पर थोडा गौर करके इन समस्याओं को सुलझाने के हेतु को केन्द्र में रखकर सरकार की नीतियां बनायेंगे, तो आप के आगमन से पैदा हुइ आश साकार स्वरुप ले पाएगी | मैं और मेरे जैसे भारतवर्ष के अन्य सामान्य नागरिकों की आप से कुछ अपेक्षाएं हैं, जो मैं यहां प्रतिघोषित करता हुं |

१) किसी भी सरकारी डीपार्टमेन्ट से छोटा या बडा कोई भी काम कराना हो तो भारत में किसी ना किसी सरकारी अफ्सर या politician को पैसा देकर “सेटींग” करनी ही पडती है | एक बार एक किसी पावरफूल व्यक्ति के साथ “सेटींग” हो गइ फिर फटाफट काम होने लगता है | भारत की यह अनोखी Single Window Clearing System, यह “सेटींग” बिझनेस, बन्द हो और योग्यता अनुसार काम हो ऐसी अपेक्षा |

२) बचपन से ही भारतवासीयों को पुलिस से डरने का सिखाया गया है | भारत के politicians इस डर को अच्छी तरह से समझ गये हैं और लोगों को डराकर अपना काम कराने के लिए पुलिस को use करते हैं | नीडर भारत के लिए निष्पक्ष पुलिस की आवश्यकता है | पुलिस को politicians के डर से मुक्ति मिलेगी तो ही पब्लिक को पुलिस के डर से मुक्ति मिलेगी | सामान्य भारतवासी को खुद को हुए अन्याय की फरियाद करनेे के लिए पुलिस स्टेशन तक जाने में जो डर लगता है, उस डर को दूर करने का निवेदन |

३) कोइ भी व्यक्ति अपना १००% तभी दे सकता है, जब वह भयमुक्त हो | लोगों को सरकार से यह अभयदान मिल सकता है, लेकिन आज पुलिस या कोइ भी सरकारी अमलदार खुद ही आमजनता को डराकर, भयभीत करके उनका फायदा उठाते हैं | हर राज्य में एक कोमन फोन-नंबर की हेल्प-लाइन देकर लोगों को किसी भी सरकारी अमलदार से भयमुक्ति दिलायें ऐसी प्रार्थना |

४) जनता को हेल्प करने के लिए हम अलग-अलग प्रकार की हेल्प-लाईन तो चालु कर डालते हैं, लेकिन कुछ महिनों बाद उसे attend करनेवाला ही कोइ नहीं होता | अगर होता है, तो वह कोइ गुस्सेवाला भूखा-प्यासा, पीडित आदमी होता है, जो हेल्प कम करता है, भौंकता ज्यादा है | हेल्प-लाइन पर बिच-बिच में फोन कर के वह सो न जाय ऐसी व्यवस्था हो तो सही मदद होगी |

५) दूसरा डरावना शब्द है Taxes | एक तो अनेक प्रकार के टैक्ष और उपर से उनका पेपरवर्क | टैक्ष के सारे कायदे कानून इतने पेचीदे हैं की उन सब का पालन करना अत्यंत मुश्किल है | टैक्ष की पूरी प्रक्रिया को सरल बनाना जरुरी है | दूसरी यह मान्यता की सरकार को टेक्ष देंगे तो ९०% हिस्सा politicians और सरकारी कर्मचारी “खा” जाएंगे | यह खाना-पीना बन्द हो और जनता से मिले टैक्स का सही उपयोग हो ऐसी गुज़ारीश |

६) भारत में सरकार कोइ भी प्रोजेक्ट के पीछे १०० रुपये खर्चेगी तो उस में से २५ रुपयों का ही काम होगा ऐसी मान्यता है | बाकी की रकम अनेक जरुरतमंद लाभार्थी लोगों में बंट जाएगी | यह जरुरतमंदों में बंटवारा बन्द हो और पूरी रकम नियत प्रोजेक्ट पर खर्च हो ऐसी पारदर्शक व्यवस्था करने की प्रार्थना | हमारा देश गरीब नहीं है, लेकिन सरकार-Politicians और सरकारी कर्मचारियों के लोभ-लालच की वजह से बहुत धन लीकैज हो रहा है | इस लीकैज को त्वरा से भरें |

७) कश्मीर के ओमर अब्दुल्लाह जब राजनीति में आये तब एक टी.वी. इन्टरव्यू में उन्होंने कहा था “मेरे पिताने कहा कि पोलिटीक्स एक अच्छी लाईन है, इस लिए मैंने राजनीति में आने का निर्णय लिया |” शायद ओमर अब्दुल्लाह उस वक्त नासमज थे इस लिए उनके दिल की बात ज़बान पर आ गई | लेकिन अकेले फारुक अब्दुल्लाह ही नहीं, भारत के सारे politicians राजनीति को Profession नहीं लेकिन एक Business मानते हैं, और ज्यादातर किस्सों में देश और उसकी प्रजा को लूटने का कारोबार चलाते हैं | यह धन्दा बन्द करें |

८) किसी भी सरकारी अस्पताल में सारी सुविधाओंका बजेट पास होते हुए भी आम जनता को सही ट्रीटमेन्ट नहीं मिल सकती | सरकारी अस्पताल world class सुविधा और सर्विस दे पायें ऐसी व्यवस्था की अभिलाषा |

९) सफाई के लिए जरुरत से ज्यादा स्टाफ और साधन होते हुए भी हमारे देश का कोई भी जाहीर स्थल हमेशा गंदा ही रहता है | रेल्वे-बस स्टेशन, होस्पिटल्स, स्कूल्स, सरकारी दफ्तर, राह-रस्ते, गार्डन सब कुछ एरपोर्ट की तरह साफ-सुथरा और चकाचक रखने का बजेट तो पास हो जाता है, लेकिन काम नहीं होता | सिर्फ बजेट ही नहीं, काम भी उसी क्वोलिटी का हो यह देखें | इस परिस्थिति में १००% सुधार संभव भी है, और अपेक्षित भी है |

१०) कोई भी सरकारी नौकरी मतलब “चांदी” | सरकारी नौकरी मतलब बिना काम किये पैसा कमाने का लाइसन्स | सरकारी नौकरी मतलब “उपर की कमाई” का अविरत स्त्रोत | सरकारी नौकरी सब से पहले एक सेवा कार्य है, और अपने कार्य से देश की सेवा कर के रोजगार पाने का एक प्रामाणिक ज़रिया है, यह भावना सरकारी दामादों के मन में जाग्रत हो ऐसे ठोस कदम की अपेक्षा |

११) सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले अफ्सरों को यहां-वहां तबादला कराने की और उनका promotion करने की सत्ता politicians के पास होने से अफ्सर खुले मन से काम नहीं कर सकता | वह डरा हुआ रहता है | अफ्सरों की भर्ती, तबादले या प्रमोशन को योग्यता के आधार पर पारदर्शक बनायें |

१२) जिन commercial activities में सरकार की कंपनियां (PSUs) हैं, उन में से ज्यादातर PSUs में जरुरत से बहुत ज्यादा स्टाफ और अन्य resources हैं फिर भी उन के private sector के competitors से उनका नफा कम है, या वह नुकसान कर कहे हैं | उन सब को अपनी कार्यक्षमता और profitability बढ़ाने का मौका दिया जाय | और अगर वह ऐसा न कर पायें तो उन्हें Private कंपनियों को सोंपा जाय |

१३) देश के अलग अलग राज्यों में कुछ ऐसे विस्तार हैं, जहां किसी लोकल गुंडे, politician, ग्रुप या किसी कौम की सरकार चलती है | ऐसी हर parallel government को चुन-चुन कर उस के उपर भारत के सार्वभौमत्व को स्थापित करने का आवेदन |

१४) इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बडे बडे प्रोजेक्ट तो बन जाते हैं, लेकिन उन्हें आम आदमी कैसे use कर पाये ऐसा ध्यान में रखा जाय, तो बहुत अच्छा होगा | यहां मुंबइ के T2 जैसे टर्मिनल, या बडे हाइ-वे तो बन जाते हैं, लेकिन उनके अंतिम फिनिशिंग या योग्य signage जैसे छोटे काम बाकी छोड दिये जाते हैं, जिससे सामान्य जनों का समय-शक्ति व्यय होता है और उन्हें काफी असुविधाओंका सामना करना पडता है |

१५) आज ज्यादातर सरकारी स्कूलों या कोलेज में शिक्षा का स्तर एकदम निम्न कक्षा पर चला गया है | बच्चों को डीग्रीयां तो मिलतीं हैं पर उन्हें कुछ प्रेक्टिकल ट्रेनिंग न मिलने की वजह से वह किसी काम के पात्र नहीं होते | शिक्षा-व्यवस्था खराब होने की दूसरी एक वजह है, शिक्षकों की गुणवत्ता | पगार कम होने की वजह से अच्छे लोग शिक्षक बनना पसंद नहीं करते | अर्थहीन शिक्षा-व्यवस्था बेरोजगारी की मुख्य वजह है | शिक्षा को अर्थपूर्ण बनाने की बिनंती |

१६) भारत में बेरोजगारी का एक दूसरा बडा कारण है, Unions | इधर भी अलग-अलग राजनैतिक पार्टीयां कम से कम काम करके ज्यादा लाभ पाने के सपने दिखाकर employees की आदतों के साथ बिझनेस की कार्यक्षमता और profitability बिगाड रहीं हैं | Labour laws में उचित परिवर्तन की आवश्यकता है | नौकरी मिलना नहीं बल्की काम पाना हक होना चाहिए | जोब मार्केट में राजनैतिक पार्टीयां तथा युनियनों की दखल बन्द होंगी तो ही सब का भला होगा |

१७) Information Technology का सही उपयोग करें | आम जनता को रोज काम आनेवाली information किसी वेबसाइट या और किसी माध्यमों से समय पर मिले तो हर साल लाखों दिनों का समय बच जाएगा | इन्डीयन रेलवे की online बूकींग की साइट तत्काल के बूकींग के समय दो घंटों तक खुले ही नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए | इस के जैसे अनेक उपायों से आमजनता का अधिकांश समय बचेगा जो देश के आर्थिक विकास में उपयुक्त हो सकता है |

१८) मुंबइ जैसे शहरों में फुटपाथों पर चलने की जगह ही नहीं हैं | फूटपाथ पर फेरिवालों तथा व्यापारियों का कब्ज़ा है | फुटपाथ मुक्त हों तथा चलने योग्य बनें ऐसी अपेक्षा |

१९) मुंबइ को Shanghai जैसा बनाने के वायदे देकर काफी सरकारोंने अनेक प्रोजेक्ट पास करवाकर करोडों रुपयों का खान-पान किया है | मुंबइ के ज्यादातर रास्तों पर कहीं भी 100 मीटर का अच्छी गुणवत्ता का, बिना उबड-खाबड का रास्ता नहीं है | Shanghai जैसा बनाने के लिए अनेक लोगों ने Shanghai की यात्राएं कीं, बडे बजेट पास करवाये, और अंत में हमें खड्डे ही मिले हैं | ऐसी सपनों की सौदागरी बन्द होगी ऐसी उम्मीद |

२०) मुंबइ की लोकल ट्रेन तथा सीटी बस सर्विस अच्छी है लेकिन उसे आधुनिक और कार्यक्षम बनाने की जरुरत है | सफाइ, सुरक्षा पर ध्यान जरुरी है | ट्रेन-बस की डिझाईन या उस संबंधी अन्य कोइ निर्णय लेने वाले बडे लोग इन ट्रेन-बस में सफर करें और लोगों को क्या परेशानियां होतीं हैं उस का वास्तविक अनुभव करें ऐसा compulsory बनायें | मुंबइ जैसी पब्लिक ट्रान्सपोर्ट व्यवस्था सारे शहरों में स्थापित करें ऐसी अपेक्षा |

२१) न्याय व्यवस्था में भरपूर परिवर्तन जरुरी है | तारीख-पे-तारीख की वजह से Indian Judiciary पर से आम जनता भरोसा उठ गया है | “कानून है” यह सबूत न्याय व्यवस्था की ओर से पेश हो ऐसी व्यवस्था करेंगे तो बडी महेरबानी होगी |

२२) भारत में किसी भी सरकारी दफ्तर में जाएंगे तो अपना काम कितने समय में पूरा होगा इस की कोइ गेरंटी नहीं है | सरकारी कर्मचारीयों में उन के तथा आम जनता के समय की कीमत के विषय में जाग्रति आये और उन में कोइ भी काम पूर्वनिश्चित समय-अवधि में पूरा हो ही जाय ऐसी accountability स्थापित करेंगे तो करोडों मानव दिनों का समय बचेगा |

भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है, लेकिन भारत के politicians और कुछ multinational कंपनियां हीं इस का साक्षात्कार कर रहे हैं | उपर कथित बातों पर कुछ ठोस काम होगा, आम जनता की जिंदगी आसान होगी तो मेरे जैसे सामान्य नागरिकों को भी भारत सोने की चिड़िया ही महसूस होगी |

हार्दिक शुभेच्छाओं के साथ आभार…

– भारत का सामान्य नागरिक

Author: Sanjay Shah

Sanjay is the author of "Business Management Simplified" which provides Practical, Actionable Solutions for Entrepreneurs. It is an all-in-one guidebook to start, run and grow a small and mid-size business to the next level. He is also an SME Business Coach, Seminar Leader and Motivational/Keynote speaker, Sanjay is based in Mumbai (India). He advises many businesses on Strategy, Leadership, Marketing, Branding, Customer Experience Management and Organization Development. He conducts various self-help seminars and workshops for companies and groups in English, Hindi and Gujarati. For more info, visit : www.SanjayShahSeminar.com

2 thoughts on “एक सामान्य भारतीय का श्री नरेन्द्र मोदी को खुला निवेदन पत्र”

  1. Dear Sanjay
    It takes lots of efforts and brainstorming to define the problems of common man then only one can think about right solutions or options. Thank you for the efforts put in for defining it.
    Not all the abuses are done by politicians alone, people having vested interests like builders, industrialists, financial institutions, unions, govt employees etc misuse the system in connivance with police and polititians even NGOs are also misused.
    Main cause of it can be attributed to age old laws with lack of accountability and lack of reforms in judicial system. Why people prefer to go to Bhai to settle differences then to police or court of law?

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